मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक पत्नी को दिए जाने वाले 30,000 रुपये के मासिक गुजारा भत्ते के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि पारिवारिक न्यायालय ने पति की 1.5 लाख रुपये की आय का सही आकलन करने में चूक की है।

  • मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पत्नी के 30,000 रुपये मासिक गुजारा भत्ते के आदेश को निरस्त किया।
  • अदालत ने पाया कि पति ने अपनी सैलरी स्लिप पेश करने में विफलता दिखाई।
  • पारिवारिक न्यायालय ने पति की 1.5 लाख रुपये मासिक आय का सही मूल्यांकन नहीं किया।
  • कोर्ट ने कहा कि दस्तावेज़ छिपाने पर पति के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए था।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक महिला को 30,000 रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। न्यायमूर्ति द्वारकाधीश बंसल ने यह निर्णय सुनाते हुए टिप्पणी की कि निचली अदालत ने पति की अनुमानित 1.5 लाख रुपये मासिक आय और उसके द्वारा वेतन संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत न करने के मामले को सही ढंग से नहीं समझा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद एक विवाहित जोड़े से जुड़ा है जिनका विवाह 17 जून, 2019 को हुआ था और वे 16 जनवरी, 2020 से अलग रह रहे हैं। पत्नी ने 6 सितंबर, 2021 को पारिवारिक न्यायालय में गुजारा भत्ते के लिए आवेदन किया था। मामला वर्षों तक चलता रहा, जिसमें साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रियाओं के कारण देरी हुई। जून 2026 में, पारिवारिक न्यायालय ने पति की आय 1.5 लाख रुपये प्रति माह मानते हुए पत्नी को 30,000 रुपये मासिक भत्ता देने का आदेश दिया था, जिसे पत्नी ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।

अदालत की कड़ी टिप्पणी

उच्च न्यायालय ने पाया कि पारिवारिक न्यायालय ने पति को अपनी सैलरी स्लिप पेश करने का निर्देश दिया था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब पति ने अदालत के आदेश के बावजूद दस्तावेज़ नहीं दिए, तो अदालत को उसके खिलाफ 'प्रतिकूल निष्कर्ष' (Adverse Inference) निकालना चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि पति की 1.5 लाख रुपये की आय का आकलन करने के बाद, भत्ते की राशि 1/4 वेतन के बजाय केवल 30,000 रुपये क्यों रखी गई, इसका उचित कारण देना आवश्यक था।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला कानूनी पारदर्शिता और वित्तीय प्रकटीकरण के महत्व को रेखांकित करता है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि केवल अनुमानित आय के आधार पर गुजारा भत्ता तय करना पर्याप्त नहीं है, विशेषकर तब जब एक पक्ष जानबूझकर दस्तावेज़ों को छिपा रहा हो। यह भविष्य के मामलों में पारदर्शिता के लिए एक मिसाल कायम करता है।

अदालत के आदेशों का पालन न करना और महत्वपूर्ण वित्तीय दस्तावेज़ छिपाना कानूनी प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
Did You Know?: भारतीय कानून में 'Adverse Inference' का अर्थ है कि यदि कोई व्यक्ति अदालत में महत्वपूर्ण सबूत पेश करने से इनकार करता है, तो अदालत यह मान सकती है कि वह सबूत उसके खिलाफ ही जाता।

Frequently Asked Questions

1. हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ता क्यों रद्द किया?
क्योंकि पारिवारिक न्यायालय ने पति की आय का सही मूल्यांकन नहीं किया और उसके द्वारा सैलरी स्लिप न देने पर उचित कार्रवाई नहीं की।

2. क्या पत्नी को अब कोई भत्ता नहीं मिलेगा?
हाईकोर्ट ने वर्तमान आदेश को रद्द कर दिया है, जिसका अर्थ है कि मामले को सही कानूनी सिद्धांतों के साथ पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है।