काकीनाडा उपभोक्ता आयोग ने एसबीआई लाइफ के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि मृतक ने मधुमेह और उच्च रक्तचाप छिपाया था। कोर्ट ने बीमा कंपनी को ₹40 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
- काकीनाडा उपभोक्ता आयोग ने एसबीआई लाइफ के खिलाफ फैसला सुनाया।
- बीमा कंपनी ने 'छिपी हुई बीमारी' का हवाला देकर क्लेम देने से मना किया था।
- कोर्ट ने कंपनी को ₹39.87 लाख का भुगतान और ₹1.05 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया।
आंध्र प्रदेश के काकीनाडा जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को एक विधवा को लगभग ₹40 लाख का भुगतान करने का आदेश दिया है। यह मामला तब उठा जब बीमा कंपनी ने मृतक के पति की मृत्यु को 'दुर्घटना' मानने के बजाय यह दावा किया कि उसने पॉलिसी खरीदते समय अपनी स्वास्थ्य स्थिति, जैसे मधुमेह (Diabetes) और उच्च रक्तचाप (Hypertension), के बारे में जानकारी छिपाई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
मृतक, कोमरा नानाजी राव ने 23 अक्टूबर, 2024 को ₹40 लाख की राशि वाली 'एसबीआई लाइफ ई-शील्ड इंस्टा प्लान ए पॉलिसी' खरीदी थी। दुर्भाग्य से, 27 जनवरी, 2025 को एक मोटरसाइकिल दुर्घटना के दौरान वह काकीनाडा के पास एक नहर में गिर गए और डूबने से उनकी मृत्यु हो गई। पुलिस जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि मृत्यु का कारण 'डूबने से दम घुटना' (Asphyxia due to drowning) था और इसमें किसी भी प्रकार की आपराधिक साजिश नहीं पाई गई थी।
जब मृतक की पत्नी ने बीमा क्लेम किया, तो एसबीआई लाइफ ने इसे खारिज कर दिया। कंपनी का तर्क था कि नानाजी राव ने प्रस्ताव फॉर्म में स्वास्थ्य संबंधी सवालों के जवाब गलत दिए थे। कंपनी ने 'परम सद्भाव के सिद्धांत' (Doctrine of Utmost Good Faith) का हवाला देते हुए कहा कि यदि बीमारी की जानकारी दी गई होती, तो पॉलिसी स्वीकार नहीं की जाती।
क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि बीमा कंपनियां अक्सर तकनीकी आधारों और पुरानी मेडिकल हिस्ट्री का उपयोग करके वैध क्लेम को खारिज करने का प्रयास करती हैं। इस मामले में, आयोग ने स्पष्ट किया कि केवल कुछ मेडिकल रिकॉर्ड या दवाओं का होना इस बात का सबूत नहीं है कि व्यक्ति ने जानबूझकर जानकारी छिपाई थी।
बीमा कंपनियों को केवल संदेह के आधार पर क्लेम खारिज करने के बजाय ठोस सबूत पेश करने चाहिए कि बीमारी का संबंध मृत्यु के कारण से था।
आयोग के अध्यक्ष रघुपाथी वसंत कुमार और सदस्यों ने पाया कि पत्नी ने यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत दिए कि मृत्यु एक दुर्घटना थी। आयोग ने कहा कि एसबीआई लाइफ यह साबित करने में विफल रही कि पति ने जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए थे। इसके परिणामस्वरूप, कंपनी को न केवल बीमा राशि बल्कि मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजा भी देना होगा।
अदालत का फैसला और दंड
आयोग ने एसबीआई लाइफ को निर्देश दिया कि वह बकाया प्रीमियम काटकर शुद्ध ₹39.87 लाख का भुगतान करे, जिस पर 31 अक्टूबर, 2025 से 9% ब्याज भी शामिल होगा। इसके अतिरिक्त, कंपनी को कानूनी लागत और मानसिक प्रताड़ना के लिए ₹1.05 लाख का मुआवजा भी देना होगा।
Frequently Asked Questions
1. क्या बीमा कंपनियां पुरानी बीमारी का हवाला देकर क्लेम खारिज कर सकती हैं?
हाँ, लेकिन उन्हें यह साबित करना होगा कि बीमारी का खुलासा जानबूझकर किया गया था और उसका सीधा संबंध मृत्यु के कारण से है।
2. यदि मेरा बीमा क्लेम गलत तरीके से खारिज कर दिया जाए तो क्या करें?
आप अपने राज्य के उपभोक्ता हेल्पलाइन या राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (1915) पर संपर्क कर सकते हैं।