अहमदाबाद के चितारा समुदाय ने 300 साल पहले सामाजिक बहिष्कार के विरोध में 'माता नी पछेड़ी' नामक एक पवित्र कला को जन्म दिया था। आज नौवीं पीढ़ी के कलाकार इस लुप्त होती विरासत को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
- 'माता नी पछेड़ी' एक पारंपरिक वस्त्र कला है जिसमें देवी दुर्गा को मुख्य विषय के रूप में चित्रित किया जाता है।
- यह कला 300 साल पहले तब शुरू हुई जब देवपूजक समुदाय को मंदिरों में प्रवेश से वंचित कर दिया गया था।
- इस कला को हाल ही में भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्राप्त हुआ है।
- यह कला पोर्टेबल पूजा का एक माध्यम बनी, जिसे कहीं भी ले जाया जा सकता था।
अहमदाबाद के वासना क्षेत्र में, 22 वर्षीय ओम चितारा अपने परिवार की विरासत को सहेजने में जुटे हैं। नौवीं पीढ़ी के कलाकार के रूप में, ओम उस कला का प्रतिनिधित्व करते हैं जो केवल रंग और कपड़े का मेल नहीं है, बल्कि एक समुदाय के प्रतिरोध और श्रद्धा का प्रतीक है। 'माता नी पछेड़ी', जिसका अर्थ है 'माता के पीछे', एक ऐसा अनुष्ठानिक कपड़ा है जिस पर देवी दुर्गा के स्वरूप को अत्यंत बारीकी से उकेरा जाता है।
इस कला का इतिहास गहरा और संघर्षपूर्ण है। लगभग 300 साल पहले, जब देवपूजक (पूर्व में वाघरी) समुदाय को कई मंदिरों में प्रवेश करने से रोक दिया गया था, तब उन्होंने अपनी भक्ति को एक नया रूप दिया। यदि वे मंदिर नहीं जा सकते थे, तो वे देवी को अपने साथ ले जा सकते थे। इस प्रकार, यह कला एक 'पोर्टेबल मंदिर' के रूप में विकसित हुई, जिसे मोड़कर कहीं भी ले जाया जा सकता था और पूजा की जा सकती थी।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि 'माता नी पछेड़ी' केवल एक हस्तशिल्प नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समावेश और सांस्कृतिक लचीलेपन का एक शक्तिशाली उदाहरण है। यह दर्शाता है कि कैसे एक हाशिए पर रहने वाले समुदाय ने कला को अपने अस्तित्व और अपनी आस्था को बनाए रखने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।
इस कला की निर्माण प्रक्रिया अत्यंत जटिल और धैर्य की मांग करने वाली है। कलाकार बांस की विशेष 'कलम' का उपयोग करके बिना ब्लीच किए गए कपड़े पर चित्रण करते हैं। रंगों के लिए पूरी तरह से प्राकृतिक स्रोतों का उपयोग किया जाता है, जैसे इंडिगो (नील), मेंहदी, जंगली हल्दी, और लोहे के जंग से बना काला रंग। एक 2×2 फीट के टुकड़े को तैयार करने में लगभग ढाई महीने का समय लगता है।
"यदि धोने के दौरान कोई समस्या आती है, तो पूरी पेंटिंग बर्बाद हो जाती है; यदि रंग खराब हो जाता है, तो सब कुछ खत्म हो जाता है। इसमें गलती की कोई गुंजाइश नहीं है।" - ओम चितारा
कला की इस यात्रा में कई मील के पत्थर स्थापित किए गए हैं। ओम के पिता, किरणभाई चितारा, को 2005 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 2023 में, इस कला को GI टैग मिला, और 2025 में कलाकार भानुभाई चितारा को पद्म श्री से नवाजा गया।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: माता नी पछेड़ी का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
उत्तर: यह कला तब विकसित हुई जब सामाजिक बाधाओं के कारण समुदाय मंदिरों में नहीं जा सकता था, जिससे उन्हें घर पर ही पूजा करने के लिए एक पोर्टेबल कला की आवश्यकता पड़ी।
प्रश्न 2: इस कला में किन रंगों का उपयोग किया जाता है?
उत्तर: इसमें मुख्य रूप से प्राकृतिक रंगों का उपयोग होता है, जैसे हल्दी, नील, मेंहदी और लोहे के जंग से बना काला रंग।