कृष्णक्षी कश्यप द्वारा निर्देशित और भास्कर ज्योति ओझा के संगीत से सजी यह प्रस्तुति असम की भक्ति विरासत और 'पंचभूतों' के माध्यम से कृष्ण को ब्रह्मांडीय चेतना के रूप में चित्रित करती है।
- सत्रिया नृत्य के माध्यम से कृष्ण को पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के रूप में प्रदर्शित किया गया।
- गुवाहाटी के श्री श्री माधवदेव इंटरनेशनल ऑडिटोरियम में 'सत्रियाकृष्टि' द्वारा शानदार प्रस्तुति।
- संगीत में बोरगीत, भातिमा और प्रसंगिया सुर जैसे पारंपरिक असमिया रूपों का समावेश।
गुवाहाटी के श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र स्थित श्री श्री माधवदेव इंटरनेशनल ऑडिटोरियम में हाल ही में एक अद्वितीय सांस्कृतिक संगम देखने को मिला। कृष्णक्षी कश्यप द्वारा संकल्पित और कोरियोग्राफ की गई प्रस्तुति 'सर्वभूतাত্মा श्री कृष्ण' ने दर्शकों को भक्ति और दर्शन के एक गहरे सफर पर ले गया। इस नृत्य नाटिका का मुख्य उद्देश्य श्री कृष्ण को केवल पौराणिक कथाओं के पात्र के रूप में नहीं, बल्कि उस सर्वव्यापी चेतना के रूप में दिखाना था, जिससे संपूर्ण प्रकृति का संचालन होता है।
इस प्रस्तुति का वैचारिक ढांचा 'पंचभूतों' पर आधारित था। कोरियोग्राफर ने प्रकृति की पांच मौलिक शक्तियों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—को कृष्ण की दिव्य अभिव्यक्तियों के केंद्र में रखा। उदाहरण के लिए, गोवर्धन पर्वत उठाने की लीला को पृथ्वी से, कालिया दमन को जल से, वन की अग्नि के भक्षण को अग्नि से, बांसुरी की मधुर तान को वायु से और अर्जुन को दिए गए विश्वरूप दर्शन को अनंत आकाश से जोड़ा गया।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह प्रस्तुति केवल एक नृत्य प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक सत्रिया व्याकरण को समकालीन दार्शनिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ने का एक साहसी प्रयास है। यह दिखाता है कि कैसे शास्त्रीय कलाएं अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक वैचारिक विमर्श को जन्म दे सकती हैं।
तकनीकी दृष्टि से, इस प्रदर्शन में 'शुद्ध नृत्य' और 'अभिनय' के बीच एक बेहतरीन संतुलन था। कलाकारों ने 'उलाह' (Ulaah)—जो सत्रिया नृत्य की विशिष्ट गरिमा और उछाल है—को बखूबी प्रदर्शित किया। समूह नृत्य में कलाकारों का समन्वय इतना सटीक था कि वह व्यक्तिगत प्रदर्शन से ऊपर उठकर एक सामूहिक आध्यात्मिक ऊर्जा में बदल गया।
सत्रिया नृत्य का व्याकरण जब दर्शन के साथ मिलता है, तो वह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि एक ध्यान (meditation) बन जाता है।
इस प्रस्तुति की एक और बड़ी ताकत इसकी साहित्यिक गहराई थी। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार विजेता भास्कर ज्योति ओझा ने श्रीमद्भागवत, श्रीमंत शंकरदेव की 'कीर्तन घोषा' और श्री श्री माधवदेव की 'नाम घोषा' से सामग्री संकलित की। संगीत में बोरगीत, भातिमा और प्रसंगिया सुर का उपयोग कर असम के भक्ति परिवेश को जीवंत कर दिया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत 'सत्रियाकृष्टि' के सबसे युवा छात्रों द्वारा 'कृष्ण नृत्य' और 'माटी अखरा' के प्रदर्शन से हुई, जो यह दर्शाता है कि कृष्णक्षी कश्यप न केवल प्रदर्शन कर रही हैं, बल्कि इस प्राचीन परंपरा के संचरण (transmission) और संरक्षण पर भी काम कर रही हैं।
Frequently Asked Questions
1. 'सर्वभूतাত্মा' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है वह आत्मा या चेतना जो सभी जीवित प्राणियों और तत्वों में व्याप्त है।
2. इस प्रस्तुति में किन साहित्यिक स्रोतों का उपयोग किया गया?
इसमें श्रीमद्भागवत, कीर्तन घोषा और नाम घोषा जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का उपयोग किया गया।