नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को 'तिरुक्कुरल' का रूसी अनुवाद भेंट किया। यह प्राचीन तमिल ग्रंथ नैतिकता, राजनीति और प्रेम का एक वैश्विक मार्गदर्शक माना जाता है।

  • पीएम मोदी ने पुतिन को तिरुक्कुरल का रूसी अनुवाद भेंट किया।
  • यह ग्रंथ कवि-दार्शनिक तिरुवल्लुवर द्वारा रचित है और 1,330 दोहों में विभाजित है।
  • ग्रंथ को तीन मुख्य भागों में बांटा गया है: धर्म (Virtue), अर्थ (Polity), और काम (Love)।

नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 के हाशिए पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच एक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक हुई। इस मुलाकात के दौरान, पीएम मोदी ने एक प्रतीकात्मक और सांस्कृतिक कदम उठाते हुए पुतिन को प्राचीन तमिल ग्रंथ 'तिरुक्कुरल' का रूसी अनुवाद भेंट किया। यह अनुवाद नायरा मकरच्यान द्वारा किया गया है और इसे केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान द्वारा प्रकाशित किया गया है।

तिरुक्कुरल क्या है?

तिरुक्कुरल, जिसका शाब्दिक अर्थ "पवित्र छंद" है, प्राचीन तमिल साहित्य की एक कालजयी कृति है। इसके रचयिता महान कवि-दार्शनिक तिरुवल्लुवर (जिन्हें वल्लुवर के नाम से भी जाना जाता है) हैं। यह ग्रंथ 1,330 दोहों (कुरल्स) का संग्रह है, जिन्हें 133 अध्यायों में व्यवस्थित किया गया है। प्रत्येक अध्याय में ठीक 10 दोहे होते हैं, जो जीवन के गहन सत्यों को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करते हैं।

ग्रंथ की संरचना

भाग (Book)विषयअध्यायों की संख्या
धर्म (Aram)नैतिकता और व्यक्तिगत मूल्य38
अर्थ (Porul)राजनीति, भौतिकवाद और सामाजिक-आर्थिक मूल्य70
काम (Inbam)प्रेम और मानवीय भावनाएं25

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, पीएम मोदी द्वारा पुतिन को यह ग्रंथ भेंट करना केवल एक औपचारिक उपहार नहीं, बल्कि 'सॉफ्ट पावर' डिप्लोमेसी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। तिरुक्कुरल की सार्वभौमिक शिक्षाएं, जो जाति, धर्म और नस्ल से ऊपर उठकर मानवता की बात करती हैं, वैश्विक नेताओं के बीच साझा मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास करती हैं। यह भारत की समृद्ध भाषाई विविधता और सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित करता है।

"तिरुक्कुरल केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानवता के लिए एक नैतिक संहिता है जो समय और सीमाओं से परे है।"

तिरुवल्लुवर ने अपनी रचनाओं में स्पष्ट किया कि नैतिकता और दया के बिना मानव जीवन निरर्थक है। उन्होंने ईर्ष्या, क्रोध और लालच को दुख का कारण बताया और आध्यात्मिकता एवं दान को जीवन के उत्थान का मार्ग माना। उनके विचार प्लेटो जैसे महान यूनानी दार्शनिकों के समकक्ष माने जाते हैं, विशेषकर शिक्षा और सद्गुण के अंतर्संबंधों को लेकर।

ऐतिहासिक रूप से, इस ग्रंथ का प्रभाव वैश्विक रहा है। 1840 में पहली बार अंग्रेजी में प्रकाशित होने के बाद, इसका अनुवाद 60 से अधिक भाषाओं में किया जा चुका है। प्रसिद्ध मिशनरी जॉर्ज उग्लो पोप ने तिरुवल्लुवर को "सार्वभौमिक मानव का कवि" (The Bard of Universal Man) की उपाधि दी थी।

क्या आप जानते हैं?: तिरुक्कुरल को अक्सर "बिना नाम की पुस्तक, बिना नाम के लेखक द्वारा" कहा जाता है क्योंकि इसकी शिक्षाएं किसी विशेष संप्रदाय के बजाय पूरी मानवता के लिए हैं।

Frequently Asked Questions

1. तिरुक्कुरल के लेखक कौन हैं?
इसके लेखक प्राचीन तमिल कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर हैं।

2. इस ग्रंथ में कुल कितने दोहे हैं?
इसमें कुल 1,330 दोहे हैं, जो 133 अध्यायों में विभाजित हैं।