तिरुचि के श्रीमती इंदिरा गांधी कॉलेज में आयोजित SPIC-MACAY क्षेत्रीय सम्मेलन में केरल के 'केरलम' दल ने पारंपरिक पावा कथकली कठपुतली कला का अद्भुत प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन न केवल सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है, बल्कि इस लुप्तप्राय कला को बचाने की चुनौती को भी उजागर करता है।

  • तिरुचि में SPIC-MACAY द्वारा आयोजित क्षेत्रीय कला सम्मेलन में पावा कथकली का प्रदर्शन किया गया।
  • केरलम दल ने 'कल्याण सौगंधिकम' और 'दुर्योधन वधम' जैसे शास्त्रीय नाटकों का मंचन किया।
  • पावा कथकली एक दुर्लभ दस्ताना कठपुतली (glove puppet) कला है जो 18वीं शताब्दी से चली आ रही है।
  • कलाकारों के अनुसार, यह कला अब विलुप्ति की कगार पर है क्योंकि इसमें आर्थिक लाभ कम है।

तिरुचि के श्रीमती इंदिरा गांधी कॉलेज में रविवार को आयोजित SPIC-MACAY क्षेत्रीय कला सम्मेलन में संस्कृति और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिला। इस अवसर पर केरल के प्रसिद्ध 'केरलम' दल ने पारंपरिक पावा कथकली (Paava Kathakali) का प्रदर्शन कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। के.सी. रामकृष्णन और उनके दल द्वारा प्रस्तुत यह कला रूप केरल की समृद्ध लोक परंपराओं का एक जीवंत उदाहरण है।

पावा कथकली: एक ऐतिहासिक विरासत

पावा कथकली, जो कि एक दस्ताना कठपुतली रंगमंच है, का इतिहास 18वीं शताब्दी से जुड़ा है। मूल रूप से, पालक्कड़ क्षेत्र के अंदीपंडारम समुदाय के कठपुतली कलाकारों ने घर के भीतर महिलाओं और बच्चों के मनोरंजन के लिए कथकली की कहानियों को इन कठपुतलियों के माध्यम से प्रस्तुत करना शुरू किया था। वरिष्ठ कठपुतली कलाकार श्रीनिवास कुन्नम्बथ के अनुसार, आज यह समूह इस कला को जीवित रखने वाले अंतिम समूहों में से एक है।

तकनीकी जटिलता और प्रदर्शन की बारीकियां

पावा कथकली अन्य कठपुतली कलाओं से भिन्न है। जहाँ अन्य शैलियों में धागों का उपयोग होता है, वहीं यहाँ कलाकार अपने अंगूठे, मध्यमा और तर्जनी उंगलियों का उपयोग करके कठपुतलियों को संचालित करते हैं। ये कठपुतलियाँ 40 से 60 सेंटीमीटर ऊंची होती हैं और इनका वजन लगभग 4 से 5 किलोग्राम तक होता है। प्रदर्शन के दौरान चेन्डा (ढोल), शंख, मंजीरा और गोंग जैसे वाद्य यंत्रों का उपयोग संगीत के लिए किया जाता है।

पावा कथकली केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उंगलियों के कौशल और पौराणिक कथाओं के जीवंत संगम का नाम है।

बौद्धिक विश्लेषण: संस्कृति के संरक्षण का संकट

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि इस तरह की पारंपरिक कलाओं का अस्तित्व अब केवल कुछ समर्पित परिवारों पर निर्भर है। कलाकारों को अपनी जीविका चलाने के लिए अन्य नौकरियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो इस बात का संकेत है कि यदि उचित सरकारी सहायता और प्रोत्साहन नहीं मिला, तो यह अमूल्य विरासत हमेशा के लिए समाप्त हो सकती है।

विशेषतापावा कथकली (Paava Kathakali)धागा कठपुतली (String Puppetry)
संचालन विधिहाथ की उंगलियों (Glove) द्वाराधागों (Strings) द्वारा
दृश्यताकलाकार पूरी तरह दृश्यमान होते हैंकलाकार अक्सर पर्दे के पीछे होते हैं
मुख्य वजन4-5 किलोग्राम प्रति कठपुतलीहल्का वजन
Did You Know?: पावा कथकली की नई कठपुतलियों की कीमत ₹40,000 से भी अधिक हो सकती है, इसलिए कलाकार पुरानी कठपुतलियों को ही मरम्मत करके उपयोग करते हैं।

Frequently Asked Questions

1. पावा कथकली किस राज्य की कला है?
यह केरल की एक पारंपरिक दस्ताना कठपुतली कला है।

2. इस कला का प्रदर्शन करने वाला प्रमुख दल कौन सा है?
केरल का 'केरलम' दल इस कला को प्रदर्शित करने वाला प्रमुख समूह है।