एक संयुक्त संसदीय समिति ने विकसित भारत शैक्षिक अधिनियम, 2025 में प्रस्तावित एकल नियामक की व्यापक शक्ति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट में दंड प्रणाली के दुरुपयोग और नियुक्तियों में देरी से संस्थागत स्वायत्तता पर पड़ने वाले प्रभावों को उजागर किया गया है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • एकल नियामक को अत्यधिक शक्ति मिलने से संस्थागत स्वायत्तता खतरे में
  • दंड प्रणाली का दुरुपयोग रोकने के लिए स्पष्ट मानदंड आवश्यक
  • वैकल्पिक नियुक्ति प्रक्रिया में देरी को कम करने के लिए समयसीमा प्रस्तावित

नई दिल्ली – एक संयुक्त संसदीय समिति ने विकसित भारत शिख्षा संस्थान बिल, 2025 को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। बिल में सभी मौजूदा उच्च शिक्षा नियामकों – यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई – को समाप्त कर एक ही केंद्रीय नियामक स्थापित करने का प्रस्ताव है। समिति की ड्राफ्ट रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसी शक्ति का एकत्रीकरण ब्यूरक्रेटिक या वैचारिक अतिक्रमण का कारण बन सकता है, जिससे वर्तमान में मौजूद संस्थागत स्वायत्तता क्षीण हो सकती है।

पृष्ठभूमि और राष्ट्रीय संदर्भ

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) ने भारत में उच्च शिक्षा को पुनर्गठित करने की दिशा में कई बदलावों की रूपरेखा तैयार की थी। इस नीति के तहत नियमन, मानकीकरण और मान्यता को तीन अलग-अलग परिषदों में विभाजित करने का प्रस्ताव था, लेकिन विकसित भारत शिख्षा संस्थान बिल इसे एक ही नियामक में समेट रहा है। इस बदलाव के समर्थन में कहा गया है कि यह प्रक्रिया को तेज़ और अधिक पारदर्शी बना देगा, परन्तु आलोचक तर्क देते हैं कि यह संस्थानों की स्वतंत्रता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा।

दण्ड प्रणाली और उसके जोखिम

बिल में प्रस्तावित ग्रेडेड पेनल्टी आर्किटेक्चर को समिति ने “मनमाने ढंग से लागू नहीं किया जा सकता” कहा है। दण्ड केवल सिद्ध उल्लंघनों के साथ जुड़ना चाहिए, ताकि यह एक वास्तविक प्रतिरोधक तंत्र बन सके, न कि नियामक के हाथ में दुरुपयोग का साधन। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बार-बार उल्लंघन करने वाले संस्थानों के प्रमुखों को हटाने की संभावना है, जिससे व्यक्तिगत नेताओं पर अत्यधिक दबाव पड़ सकता है।

नियुक्तियों में देरी को रोकने के उपाय

समिति ने सुझाव दिया है कि वरिष्ठ पदों के खाली होने से कम से कम छह महीने पहले नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की जाए और 90 दिनों के भीतर पूर्ण हो। जबकि राष्ट्रपति द्वारा प्रमुख पदों की नियुक्ति की सिफारिश की गई है, अन्य सदस्यताओं के लिए केंद्र सरकार को सीधे नियुक्ति करने का प्रस्ताव है, ताकि वर्तमान में देखी गई देरी समाप्त हो सके।

भविष्य की संभावनाएँ

यदि बिल पारित हो जाता है, तो भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली एक अभूतपूर्व केंद्रिकरण का सामना करेगी। यह परिवर्तन संस्थानों की कार्यात्मक स्वायत्तता, शैक्षणिक स्वतंत्रता और नवाचार क्षमताओं को कैसे प्रभावित करेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि नियामक शक्ति के संतुलन को सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट नियम, स्वतंत्र निगरानी और पारदर्शी दण्ड प्रक्रिया अनिवार्य होगी।