केरल के श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय में कुलपति सीज़ा थॉमस के कथित 'नकली अंतिम संस्कार' को लेकर विवाद गहरा गया है। जहाँ छात्र संगठन इसे थिएटर उपकरण की कमी का प्रदर्शन बता रहे हैं, वहीं कुलपति ने इसे गंभीर अपमान करार दिया है।
- एसएफआई (SFI) कार्यकर्ताओं पर कुलपति का नकली अंतिम संस्कार करने का आरोप।
- छात्रों का दावा है कि यह थिएटर विभाग के खराब उपकरणों के विरोध में एक प्रतीकात्मक प्रदर्शन था।
- कुलपति ने राज्यपाल से शिकायत कर इसे अपमानजनक और डराने वाला बताया है।
- राज्य सरकार के मंत्रियों ने इस घटना को 'असभ्य विरोध' करार दिया है।
केरल के कालाडी स्थित श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय (SSUS) में राजनीतिक तनाव चरम पर है। अगस्त के मध्य में हुई एक घटना ने पूरे राज्य के शैक्षणिक गलियारों में बहस छेड़ दी है। विवाद का केंद्र एसएफआई (SFI) कार्यकर्ताओं द्वारा कुलपति सीज़ा थॉमस के कथित 'नकली अंतिम संस्कार' का मामला है।
घटना 13 अगस्त, 2026 की है, जब विश्वविद्यालय का सिंडिकेट पुनर्गठन के बाद पहली बैठक कर रहा था। इसी दौरान छात्र प्रदर्शन कर रहे थे। विवाद तब गहरा गया जब सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो वायरल हुए, जिनमें प्रदर्शनकारी स्पॉटलाइट लेकर अंतिम संस्कार जैसे दृश्य रचते नजर आ रहे थे।
विवाद के दो पहलू
इस मामले में दो बिल्कुल विपरीत दावे सामने आए हैं। एसएफआई के राज्य सचिव पी. एस. संजीव ने स्पष्ट किया है कि थिएटर विभाग के छात्रों ने केवल एक प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन किया था। उनके अनुसार, छात्रों के पास उपयोग के लिए खराब स्पॉटलाइट्स और उपकरण थे, जिसे दिखाने के लिए उन्होंने इस तरह का प्रदर्शन किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रदर्शन को कुलपति के अंतिम संस्कार के रूप में पेश करके छात्रों को डराने की कोशिश की जा रही है।
दूसरी ओर, कुलपति सीज़ा थॉमस ने केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर को भेजी अपनी शिकायत में बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने उनका एक पुतला निकाला और ईसाई रीति-रिवाजों के साथ उसका नकली अंतिम संस्कार किया। उन्होंने कहा, "प्रदर्शनकारियों ने नारेबाजी की और मेरी कथित मृत्यु का मजाक उड़ाया। पुतले को जलाया भी गया और इसका वीडियो सोशल मीडिया पर फैलाया गया।"
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल एक छात्र विरोध का नहीं है, बल्कि यह शैक्षणिक संस्थानों में अनुशासन और विरोध की सीमाओं पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि छात्र आंदोलनों में इस तरह की प्रतीकात्मकता का उपयोग व्यक्तिगत अपमान के लिए किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक विरोध की गरिमा को कम करता है।
शैक्षणिक संस्थानों में विरोध का स्वरूप रचनात्मक होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत गरिमा पर प्रहार करने वाला।
इस घटना पर राज्य सरकार ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। गृह मंत्री रमेश चन्नथला ने कहा कि एक सभ्य समाज में इस तरह का व्यवहार स्वीकार्य नहीं है। वहीं, उच्च शिक्षा मंत्री रोजी एम. जॉन ने इसे 'असभ्य विरोध' करार दिया। पुलिस ने इस मामले में चार एसएफआई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था, जिन्हें हाल ही में जमानत मिल गई है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
केरल के विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति हमेशा से सक्रिय रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में प्रदर्शन के तरीकों में आक्रामकता देखी गई है। एसएफआई और अन्य छात्र संगठन अक्सर बुनियादी ढांचे की कमी और फैकल्टी के रिक्त पदों को लेकर संघर्ष करते रहे हैं।
Frequently Asked Questions
1. एसएफआई का इस मामले पर क्या स्टैंड है?
एसएफआई का कहना है कि यह केवल थिएटर उपकरणों की कमी को दर्शाने वाला एक प्रतीकात्मक प्रदर्शन था, न कि कुलपति का अपमान।
2. कुलपति ने क्या शिकायत दर्ज कराई है?
कुलपति ने राज्यपाल से शिकायत की है कि उनका पुतला बनाकर ईसाई अंतिम संस्कार की रस्मों के साथ उनका अपमान किया गया।