शिक्षा विशेषज्ञों ने कहा कि डिजिटल स्वास्थ्य और डिजिटल साक्षरता को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए और महीने में कम से कम एक बार डिजिटल स्वच्छता पर कक्षा आयोजित की जानी चाहिए। यह पहल बच्चों को तकनीक के लाभ और जोखिमों के बीच संतुलन बनाने में मदद करेगी।

  • डिजिटल स्वास्थ्य व साक्षरता को स्कूल पाठ्यक्रम में जोड़ा जाए
  • हर महीने कम से कम एक बार डिजिटल स्वच्छता पर कक्षा आयोजित की जाए
  • शिक्षक‑अभिभावक सहयोग से बच्चों में स्वस्थ डिजिटल आदतें विकसित हों

सम्पूर्ण रिपोर्ट

चेंनी में बुधवार को आयोजित “द न्यू स्कूल ऑफ थॉट” शैक्षिक सम्मेलन में, विशेषज्ञों ने डिजिटल स्वास्थ्य और डिजिटल साक्षरता को स्कूल के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। यह सम्मेलन द हिंदू इन स्कूल द्वारा ब्लू स्कॉर्प के साथ साझेदारी में आयोजित किया गया था।

स्नेहा संस्थान की संस्थापक एवं वीसिएस के मनोविज्ञान विभाग प्रमुख लक्ष्मी विजयकुमार ने बताया कि सात वर्ष तक बच्चों को डिजिटल एक्सपोज़र से दूर रखा जाना चाहिए, जबकि 12 वर्ष से ऊपर के बच्चों को नियंत्रित एवं मार्गदर्शित एक्सपोज़र देना चाहिए। उन्होंने कहा, “शिक्षक और अभिभावकों को इस दिशा में एकजुट होना होगा।”

सेन्टर फॉर टीचर अक्रेडिटेशन की संस्थापक‑सीईओ रम्या वेंकटारामन ने एआई के उदय और निवेश की बढ़ती प्रवृत्ति को स्वीकार किया, परन्तु कहा कि तकनीक का उपयोग तभी फायदेमंद होगा जब उसकी सीमाएँ स्पष्ट हों। “जो शिक्षक तकनीक का सही उपयोग समझेंगे, वही भविष्य में प्रासंगिक रहेंगे,” उन्होंने कहा।

द हिंदू ग्रुप के मुख्य बिक्री एवं वितरण अधिकारी श्रीधर अरनाला ने बच्चों की पढ़ने की आदतों में गिरावट और ध्यान अवधि में कमी को समाचार उद्योग के लिये नई चुनौती बताया। उन्होंने बताया कि द हिंदू ग्रुप की “इन स्कूल” और “यंग वर्ल्ड” जैसी प्रकाशनें इस परिवर्तन को ध्यान में रख कर कंटेंट तैयार कर रही हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में डिजिटल साक्षरता को राष्ट्रीय शैक्षिक नीति (NEP) 2020 में प्रमुखता दी गई थी, परन्तु व्यावहारिक कार्यान्वयन में अभी भी अंतर बना हुआ है। पिछले दशक में स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट की पहुँच में तीव्र वृद्धि ने छात्रों के सीखने के तरीकों को बदल दिया, जिससे डिजिटल स्वास्थ्य के मुद्दे उभरे।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that integrating digital health education early can reduce cyber‑bullying, screen‑time related disorders, and improve overall academic performance, positioning India as a leader in responsible tech adoption.

“डिजिटल उपकरणों का सही उपयोग बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बनाता है, जबकि अनियंत्रित उपयोग जोखिम पैदा करता है,” कहा शैक्षिक मनोवैज्ञानिक डॉ. अनीता शर्मा।
Did You Know?: भारत में 2025 तक 60% स्कूलों में डिजिटल कक्षाएँ स्थापित होने की संभावना है, जो विश्व औसत से दो गुना अधिक है।

Frequently Asked Questions

डिजिटल स्वास्थ्य शिक्षा का मुख्य उद्देश्य क्या है? यह छात्रों को स्क्रीन टाइम, डेटा सुरक्षा, ऑनलाइन शिष्टाचार और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन स्थापित करने में मदद करता है।

स्कूलों में इस पाठ्यक्रम को लागू करने के लिए कौन जिम्मेदार होगा? शिक्षा विभाग, स्कूल प्रबंधन, शिक्षक और अभिभावक मिलकर नीतियों को तैयार करेंगे और नियमित प्रशिक्षण सत्र आयोजित करेंगे।