चेन्नई में आयोजित 'द हिंदू इन स्कूल एजुकेटर कॉन्फ्लुएंस 2026' में विशेषज्ञों ने चर्चा की कि कैसे अत्यधिक डिजिटलीकरण बच्चों के मस्तिष्क और एआई के युग में शिक्षकों की भूमिका को प्रभावित कर रहा है।
- सोशल मीडिया का 2 घंटे से अधिक उपयोग बच्चों के ग्रे सेल्स (Grey Cells) और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
- डिजिटलीकरण से बच्चों में चिंता, अवसाद और आत्महत्या के विचारों में 18% तक की वृद्धि देखी गई है।
- एआई (AI) के युग में केवल तकनीक नहीं, बल्कि मानवीय कौशल जैसे समस्या समाधान और संचार अधिक महत्वपूर्ण होंगे।
- शिक्षकों को एआई का उपयोग केवल एक उपकरण के रूप में करना चाहिए, न कि शिक्षण की गुणवत्ता के विकल्प के रूप में।
चेन्नई में आयोजित 'द हिंदू इन स्कूल एजुकेटर कॉन्फ्लुएंस 2026' में शिक्षा जगत के दिग्गजों ने 'नई सोच का स्कूल: पुनर्कल्पना, सीखना और नेतृत्व को आकार देना' विषय पर गहन विचार-विमर्श किया। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य तकनीक और मानवता के बीच संतुलन स्थापित करना था।
डिजिटल डिस्ट्रैक्शन और मस्तिष्क पर प्रभाव: SNEHA की संस्थापक और मनोचिकित्सा विभाग की प्रमुख डॉ. लक्ष्मी विजयकुमार ने एक चेतावनी भरी चर्चा की। उन्होंने बताया कि निरंतर डिजिटलीकरण बच्चों के मस्तिष्क में सूचनाओं को संसाधित करने वाले न्यूरोकेमिकल्स को प्रभावित कर रहा है। उनके अनुसार, यदि कोई बच्चा प्रतिदिन दो घंटे से अधिक सोशल मीडिया का उपयोग करता है, तो उसके मस्तिष्क के 'ग्रे सेल्स' पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
डॉ. विजयकुमार ने खुलासा किया कि सोशल मीडिया के उपयोग में प्रत्येक एक घंटे की वृद्धि के साथ, बच्चों में चिंता, अवसाद और आत्मघाती विचारों में 18% की वृद्धि देखी गई है। उन्होंने माता-पिता को सलाह दी कि वे बच्चों को 'बोरियत' महसूस करने दें, क्योंकि यही बोरियत उनकी रचनात्मकता को जन्म देती है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि आज के दौर में तकनीक का अनियंत्रित उपयोग केवल एक व्यवहारिक समस्या नहीं है, बल्कि यह एक न्यूरोलॉजिकल संकट बनता जा रहा है। यदि शिक्षा प्रणालियाँ और अभिभावक समय रहते सचेत नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ी के संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) पर गहरा संकट आ सकता है।
डिजिटलीकरण ने मस्तिष्क के उन न्यूरोकेमिकल्स को बदल दिया है जो सूचनाओं को संसाधित करते हैं।
एआई (AI) और शिक्षक की भूमिका: सेंटर फॉर टीचर अकीredिटेशन की सीईओ रम्या वेंकटरमन ने 'कल के शिक्षक' की अवधारणा को प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल तकनीक को कक्षा में लाने से शिक्षा में सुधार नहीं होगा। यदि शिक्षण का तरीका गलत है, तो तकनीक केवल कक्षा को 'फैंसी' बनाएगी, प्रभावी नहीं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि एआई के युग में शिक्षकों को समस्या समाधान, डिजाइन थिंकिंग और पारस्परिक कौशल जैसे मानवीय गुणों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। एआई की तैयारी का अर्थ केवल एआई का उपयोग करना नहीं है, बल्कि इसके साथ डिजिटल सुरक्षा और मानवीय क्षमताओं का विकास करना है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: सोशल मीडिया का बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: अत्यधिक उपयोग से चिंता, अवसाद और आत्मघाती विचारों में 18% तक की वृद्धि हो सकती है।
प्रश्न 2: क्या एआई शिक्षकों की जगह ले लेगा?
उत्तर: नहीं, एआई एक उपकरण है। शिक्षकों को मानवीय कौशल और एआई के विवेकपूर्ण उपयोग के बीच संतुलन बनाना होगा।