पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने विद्वान कट्टमंचि रामलिंगा रेड्डी के साहित्यिक योगदानों की प्रशंसा करते हुए एक नई पुस्तक का विमोचन किया। उन्होंने तेलुगु भाषा के संरक्षण और प्रचार के लिए व्यापक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
- पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने विद्वान कट्टमंचि रामलिंगा रेड्डी पर आधारित पुस्तक का विमोचन किया।
- कट्टमंचि को तेलुगु साहित्यिक आलोचना का अग्रदूत बताया गया।
- आंध्र विश्वविद्यालय के वैश्विक स्तर पर उदय में रामलिंगा रेड्डी की भूमिका को अतुलनीय बताया गया।
- तेलुगु भाषा के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया गया।
विशाखापट्टनम में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान, पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने विद्वान साहित्यकार कट्टमंचि रामलिंगा रेड्डी के जीवन और कार्यों पर आधारित एक महत्वपूर्ण पुस्तक, 'अभिनव विमर्शकु मार्गदर्शी कट्टमंचि' का विमोचन किया। यह पुस्तक आंध्र विश्वविद्यालय के तेलुगु विभाग के पूर्व प्रमुख वेलमाला सिम्मानना द्वारा लिखित है।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में बोलते हुए, श्री नायडू ने कट्टमंचि रामलिंगा रेड्डी को तेलुगु साहित्यिक आलोचना का पथप्रदर्शक बताया। उन्होंने कहा कि आंध्र विश्वविद्यालय को एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के संस्थान के रूप में स्थापित करने में रामलिंगा रेड्डी का योगदान 'अतुलनीय' रहा है।
साहित्यिक विरासत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
नायडू ने सिम्मानना की इस नई कृति की प्रशंसा करते हुए इसे आलोचना का एक वैज्ञानिक और आधिकारिक कार्य बताया। उन्होंने उल्लेख किया कि यह सिम्मानना का 100वां प्रकाशन है, जो आंध्र विश्वविद्यालय की शताब्दी वर्षगांठ के कुछ ही महीनों बाद आया है। श्री नायडू ने रामलिंगा रेड्डी की प्रमुख कृतियों, जैसे कि 'मुसलम्मा मरनम' और 'अर्थ शास्त्रमु' का भी विशेष उल्लेख किया।
कट्टमंचि रामलिंगा रेड्डी ने भारतीय शास्त्रीय अलंकारशास्त्र और पश्चिमी आलोचनात्मक सिद्धांतों के बीच एक सेतु का कार्य किया।
कार्यक्रम में उपस्थित विद्वानों ने बताया कि रामलिंगा रेड्डी ने भरत, दंडी और मम्मट जैसे शास्त्रीय भारतीय विद्वानों के अध्ययन के बाद तेलुगु साहित्य पर पश्चिमी आलोचनात्मक सिद्धांतों को लागू किया था। यह उनके बौद्धिक दृष्टिकोण की गहराई को दर्शाता है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि इस तरह के साहित्यिक विमोचन केवल पुस्तकों का अनावरण नहीं हैं, बल्कि क्षेत्रीय भाषाओं की बौद्धिक जड़ों को मजबूत करने के प्रयास हैं। तेलुगु जैसी समृद्ध भाषा के लिए, कट्टमंचि जैसे विद्वानों के कार्यों का पुनरुद्धार वैश्विक शैक्षणिक मंचों पर भारतीय साहित्य की स्थिति को मजबूत करता है।
जेर्रा अप्पाराओ ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि रामलिंगा रेड्डी ने 1926-1930 और 1936-1949 के बीच दो बार आंध्र विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में सेवा की। कार्यक्रम की अध्यक्षता लेखक यारलागड्डा लक्ष्मी प्रसाद ने की, जिन्होंने इस पुस्तक को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: 'अभिनव विमर्शकु मार्गदर्शी कट्टमंचि' पुस्तक के लेखक कौन हैं?
उत्तर: इस पुस्तक के लेखक आंध्र विश्वविद्यालय के तेलुगु विभाग के पूर्व प्रमुख वेलमाला सिम्मानना हैं।
प्रश्न 2: कट्टमंचि रामलिंगा रेड्डी का आंध्र विश्वविद्यालय में क्या योगदान था?
उत्तर: वे दो बार विश्वविद्यालय के कुलपति रहे और उन्होंने संस्थान को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।