दिल्ली विश्वविद्यालय ने प्रवेश सीटों में भारी वृद्धि की है, लेकिन बुनियादी आवास सुविधाओं की अनदेखी की है। सत्या निकेतन में एक पीजी इमारत के ढहने से छात्रों की सुरक्षा और आवास की गंभीर समस्या एक बार फिर चर्चा में है।
- डीयू में हजारों स्नातक सीटों के मुकाबले हॉस्टल सीटों की संख्या बेहद कम है।
- सत्या निकेतन में पीजी इमारत गिरने से 7 लोगों की मौत ने निजी आवासों की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं।
- साउथ कैंपस के कई प्रमुख कॉलेजों में छात्रों के लिए ऑन-कैंपस हॉस्टल की सुविधा न के बराबर है।
- निजी पीजी और रेंटेड रूम्स अब छात्रों के लिए मजबूरी बन चुके हैं, जहाँ सुरक्षा का कोई मानक नहीं है।
दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) में प्रवेश पाना किसी भी बाहरी छात्र के लिए एक सपने के सच होने जैसा होता है, लेकिन इस खुशी के तुरंत बाद एक कठिन चुनौती शुरू होती है: रहने का ठिकाना। जब विश्वविद्यालय की अपनी क्षमता हजारों छात्रों की जरूरतों को पूरा करने में विफल रहती है, तो छात्र ब्रोकरों और असुरक्षित निजी पीजी (Paying Guest) आवासों के भरोसे रहने को मजबूर होते हैं। हाल ही में सत्या निकेतन में एक पांच मंजिला पीजी इमारत के ढहने और सात लोगों की मौत ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और भी चिंताजनक लगती है। शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए, कॉमन सीट एलोकेशन सिस्टम (CSAS) पर 2.7 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने पंजीकरण कराया। विश्वविद्यालय के पास लगभग 71,000 स्नातक सीटें हैं, लेकिन हॉस्टल सीटों की संख्या मात्र 4,000 के आसपास है। इसका मतलब है कि अधिकांश छात्रों को निजी बाजार में शरण लेनी पड़ती है, जहाँ न तो किराए पर नियंत्रण है और न ही सुरक्षा की कोई गारंटी।
साउथ कैंपस: सुविधाओं का अभाव
साउथ कैंपस के कॉलेजों जैसे जीसस एंड मैरी कॉलेज, आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज, और राम लाल आनंद कॉलेज में ऑन-कैंपस हॉस्टल की भारी कमी है। यहाँ तक कि गार्गी कॉलेज जैसे संस्थानों में भी अपने परिसर में हॉस्टल नहीं है। इसके परिणामस्वरूप, सत्या निकेतन, गौतम नगर और मुनिरका जैसे इलाके छात्र आवासों के केंद्र बन गए हैं, जहाँ अक्सर अवैध निर्माण और ओवरलोडिंग की समस्या देखी जाती है।
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि डीयू का केवल शैक्षणिक विस्तार करना पर्याप्त नहीं है। जब तक बुनियादी ढांचा (Infrastructure) सीटों की संख्या के अनुपात में नहीं बढ़ेगा, तब तक शिक्षा का लोकतंत्रीकरण अधूरा रहेगा। आवास की कमी न केवल छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर बना देती है, जिससे 'इक्विटी' का सिद्धांत खतरे में पड़ता है।
"आवास केवल सिर पर छत का मामला नहीं है, बल्कि यह समानता (Equity) का विषय है ताकि प्रतिभा भूगोल या पीजी के खर्च से सीमित न हो जाए।"
लेडी श्री राम (LSR) कॉलेज ने हाल ही में अपने हॉस्टल को मरम्मत के बाद खोला है, लेकिन वहाँ भी केवल 150 छात्रों के लिए जगह है। यह दर्शाता है कि शीर्ष संस्थानों में भी मांग और आपूर्ति के बीच एक गहरी खाई है। छात्रों को अब न केवल पढ़ाई के लिए बल्कि अपनी जान बचाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।
प्रश्न 1: दिल्ली विश्वविद्यालय में हॉस्टल की कमी का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: विश्वविद्यालय ने शैक्षणिक सीटों में तो वृद्धि की है, लेकिन नए हॉस्टल निर्माण और बुनियादी ढांचे के विस्तार पर समान ध्यान नहीं दिया है।
प्रश्न 2: बाहरी छात्रों के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प क्या हैं?
उत्तर: छात्रों को सलाह दी जाती है कि वे केवल पंजीकृत पीजी चुनें और किराए पर लेने से पहले भवन की सुरक्षा और फायर सेफ्टी ऑडिट की जांच करें।