महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा के एक वरिष्ठ प्रोफेसर ने कुलपति को पत्र लिखकर कैंपस में धार्मिक अनुष्ठानों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है, जिसे उन्होंने धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ बताया है।
- प्रोफेसर जगृत गड़ित ने एमएस यूनिवर्सिटी में पूजा, आरती और धार्मिक प्रतीकों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
- यह मांग अगस्त में आयोजित एक ओरिएंटेशन प्रोग्राम के दौरान हुई धार्मिक गतिविधियों के बाद उठी है।
- प्रोफेसर का तर्क है कि सार्वजनिक धन से चलने वाले संस्थानों को धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांत का पालन करना चाहिए।
आस्था और शिक्षा के बीच टकराव को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा (एमएस यूनिवर्सिटी) के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख जगृत गड़ित ने कुलपति प्रो. बीएम भानगे को एक खुला पत्र लिखकर कैंपस में पूजा, आरती, कथा और धार्मिक प्रतीकों के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया है। गड़ित का कहना है कि सार्वजनिक धन से संचालित संस्थान में इस तरह की गतिविधियां धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के विपरीत हैं।
यह विवाद इस साल 4 और 5 अगस्त को आयोजित अंडरग्रेजुएट ओरिएंटेशन प्रोग्राम से शुरू हुआ। गड़ित के अनुसार, कार्यक्रम की शुरुआत माँ सरस्वती की तस्वीर के सामने दीप प्रज्वलन, संस्कृत श्लोकों और जूते उतारने की अनिवार्यता के साथ हुई। गड़ित ने इस अनुष्ठान में शामिल होने से इनकार कर दिया और इसे एक "धार्मिक प्रदर्शन" करार दिया। उनका तर्क है कि एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय के आधिकारिक मंच पर धार्मिक अनुष्ठान नहीं होने चाहिए।
प्रोफेसर गड़ित ने केवल ओरिएंटेशन प्रोग्राम का ही जिक्र नहीं किया, बल्कि उन्होंने अन्य घटनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने एक विभाग द्वारा आयोजित सत्यनारायण कथा के बाद 'शीरा प्रसाद' लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने लिखा कि हालांकि उन्हें शीरा बहुत पसंद है, लेकिन कैंपस में धार्मिक आयोजन होने के कारण उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह घटना सार्वजनिक स्थानों पर सांस्कृतिक परंपराओं और धर्मनिरपेक्षता की सख्त व्याख्या के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाती है। जब विश्वविद्यालय, जो तर्क और स्वतंत्र सोच के केंद्र होने चाहिए, धार्मिक अनुष्ठानों के स्थल बन जाते हैं, तो यह उन लोगों के लिए समावेशिता पर सवाल उठाता है जो नास्तिक हैं या अन्य आस्थाओं को मानते हैं।
एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय की पवित्रता उसके तर्कवाद और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक जनादेश में निहित है, ताकि कोई एक विश्वास बौद्धिक परिदृश्य पर हावी न हो।
गड़ित ने आरोप लगाया कि कैंपस में धार्मिकता का चलन बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि पहले दीप प्रज्वलन केवल एक प्रतीकात्मक कार्य होता था, लेकिन अब नई प्रयोगशालाओं या सुविधाओं के उद्घाटन के समय भी ब्राह्मणों को बुलाया जाता है और विधिवत पूजा की जाती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि कक्षाओं और कार्यालयों में देवी-देवताओं की तस्वीरें लगाई गई हैं और कैंपस में नए मंदिर बन गए हैं।
1973 के केशवानंद भारती मामले का हवाला देते हुए, गड़ित ने तर्क दिया कि धर्मनिरपेक्षता संविधान के "मूल ढांचे" का हिस्सा है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि हम खुलेपन और स्वतंत्र सोच से समझौता करेंगे, तो 'विकसित भारत' की नींव कैसे रखी जाएगी?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: प्रोफेसर गड़ित कुलपति से वास्तव में क्या चाहते हैं?
वे चाहते हैं कि विश्वविद्यालय एक ऐसी नीति बनाए जो सार्वजनिक स्थानों पर आरती, पूजा, कथा और धार्मिक प्रतीकों के खुले प्रदर्शन को प्रतिबंधित करे।
प्रश्न 2: क्या प्रोफेसर कैंपस के सभी मंदिरों को हटाने की मांग कर रहे हैं?
नहीं, उन्होंने सुझाव दिया कि 1949 में विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले महाराजा द्वारा विरासत में मिले मंदिरों को रखा जाए, लेकिन उसके बाद बनाए गए मंदिरों को हटाया जाए।