IIT बॉम्बे की पीएचडी स्कॉलर हेना के सीथी ने साबित कर दिया कि मातृत्व करियर में बाधा नहीं है। अपने छोटे बच्चे के साथ लैब और क्लासरूम का प्रबंधन करते हुए वह साइको-ऑन्कोलॉजी में शोध कर रही हैं।

  • हेना के सीथी IIT बॉम्बे में हेल्थ एंड मेडिकल साइकोलॉजी में पीएचडी कर रही हैं।
  • वे अपने 1.5 साल के बेटे ओमी को लैब, सेमिनार और कक्षाओं में साथ लाती हैं।
  • संस्थान के सहयोगी वातावरण और मेंटर्स के समर्थन ने उन्हें शोध जारी रखने में मदद की है।

मुंबई स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे में एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जहाँ 29 वर्षीय शोधार्थी हेना के सीथी ने मातृत्व और उच्च शिक्षा के कठिन संघर्ष को अपनी ताकत बना लिया है। हेना, जो हेल्थ एंड मेडिकल साइकोलॉजी विभाग में पीएचडी कर रही हैं, अपने डेढ़ साल के बेटे ओमी को अपने साथ लैब और कक्षाओं में लेकर आती हैं। जब उनकी नैनी उपलब्ध नहीं होती, तब हेना का दिन देर शाम से शुरू होता है और अक्सर आधी रात तक चलता है, जबकि उनका बच्चा पास ही सोता या खेलता रहता है।

हेना की यह यात्रा केवल शैक्षणिक उपलब्धि नहीं, बल्कि उन सपनों को पूरा करने की कोशिश है जिन्हें उन्होंने अपनी माँ को त्यागते हुए देखा था। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपने बच्चे को अपने लक्ष्यों के बीच एक बाधा के रूप में नहीं देखतीं। 2023 में GATE परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद, उन्होंने साइको-ऑन्कोलॉजी में शोध का निर्णय लिया। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि काफी मजबूत है, जिसमें फारूक कॉलेज (कालीकट) से बीएससी, जामिया मिलिया इस्लामिया (नई दिल्ली) से एमए और अड्यार कैंसर संस्थान से एमफिल शामिल है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, हेना का मामला भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों में 'जेंडर-सेंसिटिव' इंफ्रास्ट्रक्चर और सपोर्ट सिस्टम की आवश्यकता को रेखांकित करता है। जबकि IIT बॉम्बे का माहौल सहयोगी रहा है, लेकिन कैंपस आवास की कमी और मुंबई जैसे शहर में रहने का भारी खर्च एक बड़ी चुनौती है। यह कहानी दर्शाती है कि यदि संस्थान लचीलापन अपनाएं, तो प्रतिभाशाली महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद विज्ञान और अनुसंधान में योगदान दे सकती हैं।

"मातृत्व और शोध का संतुलन केवल व्यक्तिगत इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि एक सहायक पारिस्थितिकी तंत्र (Support Ecosystem) का परिणाम होता है।"

चुनौतियां केवल भौतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी रही हैं। हेना ने स्वीकार किया कि वे अक्सर 'मदर गिल्ट' और शोध के दबाव के बीच फंसी रहती हैं। प्रसवोत्तर अवसाद (Postpartum Blues) से जूझने के बाद, उन्होंने कैंपस के स्टूडेंट वेलनेस सेंटर से थेरेपी ली। उनके पति, मोहम्मद निजाम उल हक, जो स्वयं एक मनोवैज्ञानिक हैं और केरल में कार्यरत हैं, उन्हें वित्तीय और मानसिक संबल प्रदान करते हैं।

परीक्षाओं के दौरान स्थिति और कठिन हो जाती है, लेकिन यहाँ भी मानवीयता जीतती है। कभी उनके पति केरल से मुंबई आते हैं, तो कभी साथी छात्र ओमी की देखभाल में मदद करते हैं। डीन की अनुमति से उन्हें एक सिंगल हॉस्टल रूम भी आवंटित किया गया था ताकि वे अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें।

क्या आप जानते हैं?: साइको-ऑन्कोलॉजी मनोविज्ञान की वह शाखा है जो कैंसर रोगियों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार पर केंद्रित होती है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: हेना के सीथी किस विषय में शोध कर रही हैं?
उत्तर: वे IIT बॉम्बे के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग में हेल्थ एंड मेडिकल साइकोलॉजी (विशेष रूप से साइको-ऑन्कोलॉजी) में पीएचडी कर रही हैं।

प्रश्न 2: उन्हें कैंपस में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
उत्तर: मुख्य चुनौतियों में कैंपस आवास की प्रतीक्षा, मुंबई में रहने का उच्च खर्च और मातृत्व के साथ शोध के बीच भावनात्मक संतुलन बनाना शामिल है।