सतलुज रिव्यू: दिलजीत दोसांझ की फिल्म बताती है कि जब लोकतंत्र अपने मृतकों को भूल जाती है, सिनेमा याद रखता है

सतलुज रिव्यू: दिलजीत दोसांझ की फिल्म बताती है कि जब लोकतंत्र अपने मृतकों को भूल जाती है, सिनेमा याद रखता है। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी बताती है, जो पंजाब के आतंकवादी वर्षों के दौरान कथित तौर पर अवैध रूप से जलाए गए हजारों लोगों के परिवारों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करते हैं। यह फिल्म एक आम आदमी की कहानी है जो अपने आसपास के समाज को बदलने की कोशिश करता है। फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान ने जसवंत सिंह खालड़ा को एक बड़े नायक के रूप में नहीं दिखाया है, बल्कि उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाया है जो अपने आसपास के समाज को बदलने के लिए संघर्ष करता है। फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालड़ा का किरदार निभाया है, जो एक बैंक मैनेजर हैं और जो अपने आसपास के समाज को बदलने के लिए संघर्ष करते हैं। फिल्म में अर्जुन रामपाल ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जो एक पुलिस अधिकारी हैं जो जसवंत सिंह खालड़ा के संघर्ष में उनका साथ देते हैं। फिल्म का निर्देशन हनी त्रेहान ने किया है, जो एक नए और अनुभवी निर्देशक हैं। उन्होंने फिल्म को बहुत ही सुंदर और भावनात्मक तरीके से बनाया है। फिल्म की कहानी बहुत ही दिलचस्प और रोमांचक है, जो दर्शकों को अपनी सीट से बांधे रखती है। फिल्म में दिलजीत दोसांझ और अर्जुन रामपाल के अलावा कई अन्य कलाकारों ने भी अभिनय किया है, जिनमें सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या ओहल्यान प्रमुख हैं। फिल्म का संगीत बहुत ही मधुर और भावनात्मक है, जो दर्शकों को आकर्षित करता है। फिल्म की攝影 बहुत ही सुंदर और आकर्षक है, जो दर्शकों को अपनी सीट से बांधे रखती है।