अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने संजय लीला भंसाली की फिल्म 'पद्मावत' में जौहर के महिमामंडन पर एक नई बहस छेड़ दी है, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या ऐसे दृश्य बलात्कार पीड़ितों के लिए जीवन के बजाय मृत्यु को बेहतर बताते हैं।
- स्वरा भास्कर ने सिनेमा में सामूहिक आत्मदाह (जौहर) के रूमानीकरण की आलोचना की है।
- बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या मृत्यु को 'सम्मानजनक' दिखाना बलात्कार पीड़ितों को कलंकित करता है।
- विश्लेषण बताता है कि ऐसी प्रथाएं गहरी पितृसत्तात्मक कंडीशनिंग का परिणाम थीं।
- लेख मास मीडिया में प्राचीन हानिकारक रीति-रिवाजों के महिमामंडन के प्रति आगाह करता है।
संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत से जुड़ी चर्चा अब ऐतिहासिक सटीकता से हटकर इसके दृश्यों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर केंद्रित हो गई है। अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने हाल ही में फिल्म निर्माता को लिखे अपने 2018 के खुले पत्र का जिक्र करते हुए उस दृश्य पर अपनी गहरी असुविधा व्यक्त की, जिसमें रानी पद्मिनी और चित्तौड़ की सैकड़ों महिलाएं अलाउद्दीन खिलजी की सेना से बचने के लिए जौहर (आत्मदाह) करती हैं।
भास्कर का मुख्य तर्क 14वीं शताब्दी की महिलाओं की बहादुरी पर हमला करना नहीं है, बल्कि इस बात की आलोचना करना है कि आधुनिक दर्शकों के लिए इन दृश्यों को कैसे पेश किया जाता है। उनका तर्क है कि यौन हिंसा से बचने के लिए आत्महत्या को 'सम्मान' के अंतिम कार्य के रूप में दिखाकर, फिल्म अनजाने में बलात्कार पीड़ितों को एक विनाशकारी संदेश देती है: कि उनका जीवन उनकी कथित 'पवित्रता' से कम मूल्यवान है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि सिनेमा और सांस्कृतिक स्मृति का संगम वह जगह है जहां अक्सर खतरनाक विमर्श मजबूत होते हैं। जब मास कल्चर यौन शोषण के सदमे के ऊपर मृत्यु को चुनने के कार्य का महिमामंडन करता है, तो यह एक सामाजिक कलंक को पुष्ट करता है कि उत्तरजीवी 'अपवित्र' हो गया है। यह विमर्श केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं है; यह आधुनिक न्यायिक प्रवृत्तियों में भी दिखता है, जहां वैवाहिक बलात्कार को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है।
गुण (virtue) के नाम पर आत्म-विनाश का महिमामंडन साहस का कार्य नहीं है, बल्कि महिला के अस्तित्व पर पितृसत्तात्मक नियंत्रण की अंतिम जीत है।
स्वरा भास्कर के खिलाफ प्रतिक्रिया तीव्र रही है और अक्सर उनके शब्दों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। ट्रोलर्स ने आरोप लगाया कि उन्होंने चित्तौड़ की महिलाओं को 'कायर' कहा, जबकि उनका वास्तविक तर्क यह था कि जिस उत्तरजीवी ने जीवित रहने का विकल्प चुना, उसे कायर महसूस नहीं कराया जाना चाहिए। यह आक्रोश भारतीय समाज के एक वर्ग की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जहाँ प्राचीन रीति-रिवाजों की किसी भी आलोचना को परंपरा के नाम पर खारिज कर दिया जाता है।
ऐतिहासिक रूप से, जौहर और सती जैसी प्रथाएं शून्य में लिए गए व्यक्तिगत निर्णय नहीं थे। वे एक ऐसी संस्कृति की उपज थे जहाँ महिला की पहचान पूरी तरह से उसके पुरुष संरक्षक से जुड़ी थी। यदि संरक्षक मर जाता, तो महिला को यह विश्वास दिलाया जाता था कि उसके जीवन का कोई उद्देश्य नहीं बचा है। 1987 में 18 वर्षीय रूप कंवर का मामला, जिन्हें सती प्रथा प्रतिबंधित होने के दशकों बाद भी जिंदा जला दिया गया, यह याद दिलाता है कि ये प्रतिगामी प्रवृत्तियां फिर से उभर सकती हैं।
वैश्विक आंकड़े इस बातचीत की तात्कालिकता को और बढ़ाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, संघर्ष-संबंधित यौन हिंसा युद्ध का एक आम हथियार बनी हुई है। दुनिया भर में प्रयास उत्तरजीवियों के पुनर्वास और जीवन बचाने पर केंद्रित हैं; हालांकि, सिनेमाई विमर्श जो बलात्कार को 'मृत्यु से बदतर भाग्य' के रूप में पेश करते हैं, इन मानवीय लक्ष्यों को कमजोर करते हैं।
जौहर पर विभिन्न दृष्टिकोणों की तुलना
| पारंपरिक दृष्टिकोण | आलोचनात्मक/आधुनिक दृष्टिकोण |
|---|---|
| अत्यधिक साहस और सम्मान का कार्य। | पितृसत्तात्मक कंडीशनिंग का परिणाम। |
| महिला की गरिमा की रक्षा करता है। | यौन हिंसा के उत्तरजीवियों को कलंकित करता है। |
| उस युग का एक ऐतिहासिक विकल्प। | एक विमर्श जो प्रतिगामी प्रवृत्तियों को जगा सकता है। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: जौहर और सती के बीच क्या अंतर है?
जौहर युद्ध के दौरान capture और गुलामी से बचने के लिए महिलाओं द्वारा किया गया सामूहिक आत्मदाह था, जबकि सती में एक विधवा अपने पति की चिता पर आत्मदाह करती थी।
प्रश्न 2: स्वरा भास्कर ने पद्मावत के दृश्य पर आपत्ति क्यों जताई?
उनका मानना था कि यह दृश्य सुझाव देता है कि बलात्कार से बचने के लिए मृत्यु बेहतर है, जो वास्तविक उत्तरजीवियों को यह महसूस करा सकता है कि उनका जीवन अब जीने लायक नहीं है।