प्रसिद्ध अभिनेता और थिएटर व्यक्तित्व वाई. जी. महेंद्र ने एगमोर में अपने बचपन और पुराने मद्रास की मासूमियत को याद किया, और उसकी तुलना आधुनिक चेन्नई की भागदौड़ से की।
- वाई. जी. महेंद्र की कलात्मक यात्रा 1961 में एगमोर के म्यूजियम थिएटर से शुरू हुई।
- अभिनेता ने 'मद्रास की मासूमियत' और 'चेन्नई के अस्तित्व के संघर्ष' के बीच के अंतर को रेखांकित किया।
- उन्होंने शिवाजी गणेशन और जेमिनी गणेशन जैसे दिग्गजों से मिलने के अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए।
अपने शुरुआती वर्षों की एक मार्मिक याद साझा करते हुए, तमिल थिएटर और सिनेमा के दिग्गज वाई. जी. महेंद्र ने उस समय के मद्रास में अपने पालन-पोषण की भावुक यादें ताजा की हैं। महेंद्र के लिए, उनकी खुशी का केंद्र एगमोर था, विशेष रूप से उनके दादा-दादी का घर, जो प्रतिष्ठित म्यूजियम थिएटर के ठीक सामने था। कला के इस केंद्र की निकटता ने उनके भाग्य को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और 1961 से इसी थिएटर ने उनके पेशेवर करियर की नींव रखी।
महेंद्र ने थिएटर के पीछे की हरियाली को जीवंत रूप से याद किया, जो उनके बचपन की कल्पनाओं के लिए एक असीम खेल का मैदान था। उन्होंने इन स्थानों को अपना व्यक्तिगत 'अमेज़न' या 'कांगो' बताया, जहाँ उन्होंने टारज़न या फैंटम बनने का नाटक किया। यह उस दौर को दर्शाता है जब शहरी स्थानों में बच्चों के लिए आज की तुलना में अधिक स्वतंत्रता और प्राकृतिक अन्वेषण की सुविधा थी।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि महेंद्र की यादें केवल व्यक्तिगत पुरानी यादें नहीं हैं, बल्कि शहरी विकास पर एक समाजशास्त्रीय टिप्पणी हैं। 'मद्रास' से 'चेन्नई' का बदलाव केवल नाम का परिवर्तन नहीं है; यह एक समुदाय-केंद्रित, मासूम समाज से एक अति-प्रतिस्पर्धी महानगरीय अस्तित्व की ओर संक्रमण का प्रतीक है। नुंगमबक्कम लेडीज क्लब और पद्मा शेषाद्रि बाला भवन स्कूल के शुरुआती दिनों का उनका उल्लेख उनके व्यक्तिगत इतिहास को शहर के व्यापक सांस्कृतिक मील के पत्थरों से जोड़ता है।
भले ही उनके पिता एक साधारण सरकारी कर्मचारी थे, लेकिन थिएटर की दुनिया के संपर्क ने उन्हें तमिल सिनेमा के स्वर्ण युग के दिग्गजों से मिलने का अवसर दिया। उन्होंने मक्कल थिलगम शिवाजी गणेशन, जेमिनी गणेशन और सावित्री अम्मा जैसी महान हस्तियों से मिलने की यादें साझा कीं, जिसने संभवतः एक कलाकार के रूप में उनकी महत्वाकांक्षा और अनुशासन को प्रेरित किया।
मद्रास की कलात्मक मासूमियत से चेन्नई की उत्तरजीविता की प्रकृति में संक्रमण शहरी अलगाव के एक वैश्विक रुझान को दर्शाता है।
महेंद्र ने शहर के सिनेमाई आकर्षण का भी जिक्र किया, और बताया कि उन्होंने मरीना बीच के चित्रण को देखने के लिए फिल्म 'काधालिक्का नेरामिल्लई' को लगभग 20 बार देखा। उन्होंने मद्रास शहर को उन्हें बुनियादी मूल्य और दोस्ती का सही अर्थ सिखाने का श्रेय दिया, जो उनके अनुसार वर्तमान युग में कम होते जा रहे हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वाई. जी. महेंद्र ने अपने थिएटर करियर की शुरुआत कहाँ से की?
उन्होंने 1961 में मद्रास के एगमोर स्थित म्यूजियम थिएटर से अपनी पेशेवर यात्रा शुरू की।
महेंद्र ने अपनी युवावस्था में किन सिनेमा दिग्गजों से मुलाकात की?
उन्हें शिवाजी गणेशन, जेमिनी गणेशन और सावित्री अम्मा से मिलने का अवसर मिला।