पुणे स्थित भारतीय ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी संस्थान (IITM) के शोध में पाया गया कि मानसून के दौरान लगभग एक‑चौथाई बारिश वायुमंडल में वाष्पित हो जाती है, जिससे किसानों की जल उपलब्धता में बड़ा अंतर पड़ता है। यह खोज मौसमी जल कमी के कारणों को समझने में नई रोशनी डालती है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- लगभग 25% मानसून की बारिश वायुमंडल में वाष्पित होती है
- उच्च तापमान, कम आर्द्रता और छोटे बूँद आकार से वाष्पीकरण बढ़ता है
- यह जल उपलब्धता और कृषि उत्पादन पर गंभीर प्रभाव डालता है
भारत में मानसून का मौसम कृषि, जलभंडारण और आर्थिक स्थिरता का मूल स्तंभ माना जाता है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में लगातार कम वर्षा से किसान और नीति निर्माताओं दोनों को चिंतित किया गया है। इस संदर्भ में, पुणे स्थित भारतीय ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी संस्थान (IITM) ने एक विस्तृत अध्ययन किया, जिसमें पाया गया कि बरसात के दौरान लगभग एक‑चौथाई पानी सतह तक पहुँचने से पहले ही वायुमंडल में वाष्पित हो जाता है।
अध्ययन की पद्धति और प्रमुख खोजें
शोधकर्ताओं ने उत्तर पश्चिमी पश्चिमी घाट क्षेत्रों में वर्षा के स्थिर आयसो‑टोपिक संकेतकों (हाइड्रोजन और ऑक्सीजन) का विश्लेषण किया, जिससे बूँदों के वायुमंडल में परिवर्तन को ट्रैक किया गया। साथ ही, “बिलो क्लाउड इंटरेक्शन मॉडल (BCIM)” का उपयोग करके यह पता लगाया गया कि बूँदें क्लाउड के नीचे किस हद तक वाष्पीकरण कर रही थीं। परिणामस्वरूप औसत वाष्पीकरण दर 23% रही, जबकि अत्यधिक परिस्थितियों में यह 61% तक पहुँच गई।
वाष्पीकरण को नियंत्रित करने वाले तीन प्रमुख कारक
विज्ञानियों ने तीन मुख्य कारकों की पहचान की: बूँदों का आकार, वायुमंडलीय तापमान और आर्द्रता। जब तापमान अधिक और आर्द्रता कम होती है, तो छोटे बूँदें जल्दी वाष्पित हो जाती हैं, विशेषकर हल्की बारिश के दौरान। इस कारण से, समान मात्रा में बरसात भी विभिन्न क्षेत्रों में अलग‑अलग जल उपलब्धता प्रदान करती है।
वर्तमान जल घाटा और कृषि पर प्रभाव
जुलाई के मध्य तक भारत ने औसत मानसून वर्षा से लगभग 19% कम बारिश दर्ज की। कुल 741 जिलों में से 397 ने सामान्य से कम वर्षा प्राप्त की, जिनमें 326 जिलों में हल्का घाटा और 71 जिलों में गंभीर कमी रही। बिहार और झारखंड जैसे पूर्वी राज्य 40‑50% की बड़ी कमी का सामना कर रहे हैं। वाष्पीकरण की यह नई समझ जल संसाधन प्रबंधन और कृषि नीति में पुनः विचार की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
भविष्य की दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि जल‑संकट को कम करने के लिए मौसम विज्ञान में सूक्ष्म मॉडलिंग, वर्षा‑सुविधा (rainwater harvesting) और क्लाउड‑सेडिंग जैसी तकनीकों को अपनाना आवश्यक है। साथ ही, किसानों को मौसम‑अनुकूल बीज और जल‑संचयन तकनीकों की जानकारी देना, जल उपलब्धता की स्थिरता सुनिश्चित करने में मददगार सिद्ध होगा।