इंडियन मीटियोरोलॉजिकल डिपार्टमेंट (IMD) ने जुलाई के शेष दिनों में अधिकांश भारत में सूखे की चेतावनी जारी की है, जबकि पूर्वोत्तर और पूर्वी क्षेत्रों में बाढ़ जैसी भारी वर्षा की संभावना है। यह पूर्वानुमान कृषि, जल प्रबंधन और आर्थिक गतिविधियों पर गहरा असर डाल सकता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • जुलाई के अंतिम सप्ताह में अधिकांश भारत में सूखा रहेगा।
  • पूर्वोत्तर और पूर्वी क्षेत्रों में सामान्य से अधिक भारी बारिश की संभावना।
  • मौसम परिवर्तन के कारण कृषि और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अपनी साप्ताहिक मौसम भविष्यवाणी में बताया है कि जुलाई के शेष दिनों में देश के बड़े हिस्से में सूखा बना रहेगा, जबकि पूर्वोत्तर और पूर्वी राज्य में वर्षा सामान्य से अधिक होगी। यह पूर्वानुमान जुलाई 16‑22 तक के डेटा पर आधारित है और मौसमी ट्रफ़ के असामान्य उत्तर दिशा में स्थित होने के कारण उत्पन्न हुआ है।

पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ

भारतीय मानसून का पैटर्न अक्सर 30 % से अधिक हिस्सों में असंतुलन दिखाता है, जिससे जलसंकट या बाढ़ दोनों की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। पिछले पाँच दशकों में, समान परिस्थितियों में उत्तर भारत में भारी वर्षा और दक्षिण‑पश्चिम में सूखे की प्रवृत्ति देखी गई है। इस बार, IMD ने जुलाई की औसत वर्षा को दीर्घकालिक औसत के 94 % के स्तर तक घटते हुए बताया, जो इस महीने के मध्य में 8 % की कमी से बढ़कर 24 % तक पहुंच गया है।

कृषि और जल संसाधनों पर प्रभाव

सूखे का असर विशेष रूप से मध्य और पश्चिमी भारत के प्रमुख कृषि क्षेत्रों—जैसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान—पर पड़ेगा, जहाँ धान, गन्ना और ज्वार की फसलें जल-आधारित सिंचाई पर निर्भर हैं। दूसरी ओर, पूर्वोत्तर में भारी बारिश से बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिससे बुनियादी ढाँचे को नुकसान और मानवीय संकट की संभावना बढ़ेगी। जल संग्रहण योजनाओं को इस दोधारी स्थिति को ध्यान में रखकर पुनः मूल्यांकन करने की जरूरत है।

भविष्य की संभावनाएँ और नीति‑निर्देश

IMD ने बताया कि जुलाई के मध्य तक उत्तर‑पश्चिमी हवाएँ प्रमुख रहेंगी, जिससे मौसमी हवाओं का प्रवेश बाधित होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून की दिशा में अनियमितता बढ़ेगी, और नीति निर्माताओं को जल संरक्षण, लवणीयकरण रोकथाम और आपदा प्रबंधन के लिए लचीलापन बढ़ाने की आवश्यकता होगी। साथ ही, कृषि बीमा और जल‑संकट राहत योजनाओं को सक्रिय रूप से लागू करना अनिवार्य होगा।