शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पश्चिमी घाट के नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व में वन ऋतुओं का चक्र पूरी तरह से अनिश्चित और अस्थिर हो गया है।

  • तापमान में वार्षिक 0.01 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि और वर्षा में 3.97 मिमी की गिरावट दर्ज की गई है।
  • वनस्पति के बढ़ने के मौसम (Season) की शुरुआत और समाप्ति के समय में भारी बदलाव आया है।
  • शोला (Shola) जैसे उच्च ऊंचाई वाले वन क्षेत्रों का सूक्ष्म-जलवायु (Microclimate) बिगड़ रहा है।

पश्चिमी घाट के हृदय स्थल, नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व (NBR) में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह जंगलों के बुनियादी जैविक चक्र को भी नष्ट कर रहे हैं। हाल ही में 'रिमोट सेंसिंग' जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन ने खुलासा किया है कि बढ़ते तापमान और अनियमित वर्षा के कारण जंगलों की 'फेनोलॉजिकल' (ऋतु संबंधी) गतिविधियों में भारी उथल-पुथल मच गई है।

शोधकर्ताओं ने दो दशकों (2000-2020) के डेटा का विश्लेषण करने के लिए उपग्रह इमेजरी का उपयोग किया। अध्ययन में पाया गया कि 1950 से 2018 के बीच, नीलगिरी क्षेत्र में तापमान में प्रति वर्ष 0.01 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है, जबकि औसत वर्षा में प्रति वर्ष 3.97 मिलीमीटर की कमी आई है। ये बदलाव चार प्रमुख वन प्रकारों—नम पर्णपाती, शुष्क पर्णपाती, अर्ध-सदाबहार और आर्द्र सदाबहार वनों—को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं।

वन ऋतुओं में बदलाव का पैटर्न

अध्ययन के अनुसार, वनस्पति के हरे होने के समय (Start of Season) में दो अलग-अलग चरण देखे गए। 2001-2010 के दौरान, सभी चार प्रकार के वनों में वनस्पति का मौसम देरी से शुरू हुआ। हालांकि, 2011-2020 के बीच यह पैटर्न पूरी तरह बदल गया और मौसम की शुरुआत समय से पहले ही होने लगी। शोधकर्ता बोडी सूर्या प्रताप चंद्र किशोर के अनुसार, जलवायु परिवर्तन केवल जंगलों को हरा या भूरा नहीं बना रहा है, बल्कि यह उनकी जैविक गतिविधियों के समय को ही बदल रहा है।

जलवायु परिवर्तन केवल जंगलों को हरा या कम हरा नहीं बना रहा है; यह उनकी जैविक गतिविधियों के समय को बदल रहा है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि यह बदलाव केवल पेड़ों के बढ़ने के बारे में नहीं है, बल्कि यह पूरे खाद्य जाल (Food Web) को प्रभावित करता है। यदि कीट, पक्षी और जानवर वनस्पति के बढ़ने के समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते, तो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र ढह सकता है। नीलगिरी जैसे संवेदनशील क्षेत्र में, जहाँ जैव विविधता अत्यधिक है, यह असंतुलन विनाशकारी हो सकता है।

पुनर्स्थापना पारिस्थितिकी विज्ञानी गॉडविन वसंत बोस्को ने विशेष रूप से 'शोला' (Shola) वनों पर चिंता व्यक्त की है। ये उच्च ऊंचाई वाले वन अपनी नमी और ठंडक बनाए रखने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन अब ये अपनी नमी खो रहे हैं। पेड़ों पर उगने वाली काई (mosses) और ऑर्किड सूख रहे हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि इन वनों का सूक्ष्म-जलवायु अब पहले जैसा नहीं रहा।

Did You Know?: शोला वन पश्चिमी घाट के 'स्पंज' की तरह काम करते हैं, जो बारिश के पानी को सोखकर साल भर नदियों को पानी देते हैं।

Frequently Asked Questions

1. नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व में तापमान का क्या प्रभाव पड़ रहा है?
तापमान में निरंतर वृद्धि के कारण वनस्पति के बढ़ने का चक्र अनिश्चित हो गया है, जिससे पारिस्थितिक असंतुलन पैदा हो रहा है।

2. 'शोला' वनों को क्या खतरा है?
बढ़ते तापमान और कम नमी के कारण शोला वनों की नमी बनाए रखने की क्षमता कम हो रही है, जिससे वहां उगने वाले दुर्लभ पौधे सूख रहे हैं।