आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने विज़ाग में गूगल‑स्वामित्व वाले डेटा सेंटर के लिए पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया को अनदेखा नहीं किया जा सकता, ऐसा चेतावनी दी। अदालत ने राज्य सरकार से भूमि हस्तांतरण और अनुमतियों में संभावित irregularities पर स्पष्टीकरण मांगा।

  • हाई कोर्ट ने पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया को बाईपास नहीं करने की चेतावनी दी।
  • राज्य सरकार को भूमि हस्तांतरण और अनधिकृत अनुमतियों पर जवाब देना होगा।
  • एडवोकेट‑जनरल को सरकार की स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश मिला।

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच, जिसका नेतृत्व मुख्य न्यायाधीश लिसा गिल कर रही थीं, ने विज़ाग में गूगल‑स्वामित्व वाले डेटा सेंटर के लिए पर्यावरण मंजूरी (EC) को बाईपास करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, इस पर बल दिया। यह निर्णय एक सार्वजनिक मुद्दे के तहत दायर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) के संदर्भ में दिया गया था।

पेटिशनर जल बिरादरी के राष्ट्रीय संयोजक बोलिसेट्टी सत्यनारायण ने आरोप लगाया कि विज़ाग हाइपरस्केल डेटा सेंटर पार्क लिमिटेड (VHDCPL) को 160 एकड़ जमीन अनिश्चित रूप से हस्तांतरित की गई और पर्यावरण मंजूरी झूठी एवं अस्पष्ट आधार पर दी गई। उन्होंने यह भी कहा कि इस परियोजना में कोई डेटा स्थानीयकरण नहीं होगा, जिससे भारतीय डिजिटल अर्थव्यवस्था को लाभ नहीं पहुंचेगा।

वकील विराट गुप्ता ने यह तर्क दिया कि डेटा सेंटर के पर्यावरण इम्पैक्ट असेसमेंट (EIA) में गूगल का नाम स्पष्ट रूप से नहीं लिखा गया था और जमीन सिम्हाचलम देवस्थान से संबंधित है, जिससे उसकी वैधता पर सवाल उठता है। साथ ही, साइट कंबालकोंडा रिज़र्व फॉरेस्ट के इको‑सेंसिटिव ज़ोन से केवल एक किलोमीटर दूर स्थित है, जिससे इसे केटेगरी‑ए प्रोजेक्ट माना जाना चाहिए, जिसके लिए केंद्र सरकार की विस्तृत जांच आवश्यक है।

सरकार के वकील ने कहा कि सभी प्रासंगिक अधिनियमों का पालन करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं और भूमि‑लीज़/हस्तांतरण संबंधी एक समेकित उत्तर जल्द प्रस्तुत किया जाएगा। उन्होंने बताया कि नौ विभिन्न विभाग इस मामले में पार्टी बने हुए हैं।

मुख्य न्यायाधीश लिसा गिल ने कहा कि पर्यावरण की रक्षा राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है और प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों के नाम मिलने पर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। यह बयान पर्यावरणीय अनुपालन की कड़ाई को दर्शाता है, विशेषकर जब बड़े‑पैमाने पर ऊर्जा‑सघन इन्फ्रास्ट्रक्चर की बात हो।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that this case sets a precedent for stricter judicial scrutiny of tech‑giant data‑center projects in India, forcing corporations to adhere to transparent environmental norms before gaining land and permits.

"पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी से न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को खतरा होता है, बल्कि कानूनी जोखिम भी बढ़ता है," कहते हैं पर्यावरण कानून विशेषज्ञ डॉ. रिया मेहता।
Did You Know?: विज़ाग में स्थित कंबालकोंडा रिज़र्व फॉरेस्ट को 1994 में इको‑सेंसिटिव ज़ोन के रूप में घोषित किया गया था।

Frequently Asked Questions

Q1: क्या डेटा सेंटर को भारत में डेटा स्थानीयकरण की आवश्यकता है?
A: वर्तमान में, सार्वजनिक रिकॉर्ड्स एक्ट के तहत कुछ वर्गों के डेटा का स्थानीयकरण अनिवार्य है, पर गूगल ने इस प्रोजेक्ट में ऐसा नहीं किया है।

Q2: यदि अदालत प्रक्रिया में त्रुटि पाती है तो क्या परिणाम होंगे?
A: अदालत के पास अनुमतियों को रद्द करने, फाइलिंग को पुनः शुरू करने और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की शक्ति है।