होसनगर के किसान पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव के खिलाफ पदयात्रा निकालेंगे। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि बिना जमीनी सर्वेक्षण के यह फैसला लिया गया है।
- होसनगर के किसान पश्चिमी घाट के ESA ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के विरोध में पदयात्रा करेंगे।
- विरोध का मुख्य कारण स्थानीय समुदायों और ग्राम पंचायतों से परामर्श की कमी है।
- किसानों ने केरल मॉडल की मांग की है, जिसमें कृषि और आवासीय भूमि को बाहर रखा जाए।
कर्नाटक के शिवमोगा जिले के होसनगर तालुकम में तनाव का माहौल है। पश्चिमी घाट के एक विशाल हिस्से को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने के केंद्र सरकार के मसौदा अधिसूचना के खिलाफ स्थानीय किसानों ने मोर्चा खोल दिया है। 'पश्चिमी घाट रैता सहकार वेदिक' के बैनर तले, किसान शनिवार को करगाड़ी के सिद्धि विनायक मंदिर से होसनगर तक लगभग 9 किलोमीटर की पदयात्रा निकालेंगे।
शिवमोगा जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के अध्यक्ष आर.एम. मंजुनाथ गौड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि इस मसौदे में 20,668 वर्ग किमी क्षेत्र को शामिल किया गया है, जिसमें होसनगर के 125 गांव, मानव बस्तियां और कृषि भूमि भी शामिल हैं। किसानों का कहना है कि यह निर्णय स्थानीय लोगों की जीवनशैली और आजीविका पर सीधा प्रहार है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह संघर्ष पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय आजीविका के बीच के गहरे टकराव को दर्शाता है। यदि यह अधिसूचना बिना किसी संशोधन के लागू होती है, तो पश्चिमी घाट के निवासी अपनी ही जमीन पर खेती करने और निर्माण करने के कानूनी अधिकारों को खो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिना जमीनी सर्वेक्षण के केवल उपग्रह चित्रों के आधार पर बनाई गई नीतियां अक्सर स्थानीय समुदायों के साथ संघर्ष पैदा करती हैं।
मंजुनाथ गौड़ा ने कड़ा आरोप लगाया कि डॉ. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने ग्राम पंचायतों या स्थानीय निवासियों से कोई परामर्श नहीं किया। उन्होंने कहा कि पूरी रिपोर्ट केवल उपग्रह और रिमोट-सेंसिंग इमेजरी पर आधारित है, जिसमें वास्तविक जमीनी स्थिति की अनदेखी की गई है।
केरल मॉडल की मांग
विरोध कर रहे किसान अब केरल मॉडल को अपनाने की मांग कर रहे हैं। इस मॉडल के तहत, सरकार को जमीन का भौतिक सर्वेक्षण करना चाहिए और बस्तियों, घरों और कृषि भूमि को ESA के दायरे से बाहर रखना चाहिए। किसानों का कहना है कि वे पर्यावरण संरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे केवल अपनी आजीविका की सुरक्षा चाहते हैं।
| विशेषता | वर्तमान ESA मसौदा | प्रस्तावित केरल मॉडल |
|---|---|---|
| सर्वेक्षण का तरीका | उपग्रह और रिमोट-सेंसिंग | भौतिक और जमीनी सर्वेक्षण |
| कृषि भूमि का दर्जा | ESA के दायरे में शामिल | ESA से बाहर रखने का प्रस्ताव |
| स्थानीय परामर्श | नगण्य/अनुपस्थित | अनिवार्य भागीदारी |
राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर रुख स्पष्ट किया है। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने इस विषय पर चर्चा करने के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का वादा किया है, जिससे स्थानीय लोगों में उम्मीद जगी है।
Frequently Asked Questions
1. किसान किस बात का विरोध कर रहे हैं?
किसान पश्चिमी घाट के एक बड़े हिस्से को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने के सरकारी प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं क्योंकि इसमें उनकी कृषि भूमि और बस्तियां शामिल हैं।
2. 'केरल मॉडल' क्या है?
केरल मॉडल का अर्थ है जमीन का भौतिक सर्वेक्षण करना और मानव बस्तियों व कृषि भूमि को संवेदनशील क्षेत्र के दायरे से बाहर रखना।