पश्चिमी घाटों को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ होसनगर में किसानों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। किसानों ने मांग की है कि मानव बस्तियों और खेती योग्य भूमि को इस अधिसूचना के दायरे से बाहर रखा जाए।

  • पश्चिमी घाटों के 20,668 वर्ग किमी क्षेत्र को ESA घोषित करने के खिलाफ किसानों का मार्च।
  • कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट के विरोध में किसानों ने नारेबाजी की।
  • किसानों की मांग: भूमि का भौतिक सर्वेक्षण किया जाए और खेती वाले क्षेत्रों को मुक्त रखा जाए।
  • राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर विभिन्न नेताओं ने किसानों का समर्थन किया।

कर्नाटक के होसनगर में शनिवार को भारी जनसैलाब उमड़ पड़ा जब सैकड़ों किसानों ने पश्चिमी घाटों के आसपास के क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने वाली सातवीं मसौदा अधिसूचना के विरोध में एक विशाल मार्च निकाला। यह विरोध मार्च करनगिरी से शुरू होकर लगभग नौ किलोमीटर लंबी दूरी तय करते हुए होसनगर तक पहुँचा।

वेस्टर्न घाट्स रैथा सहकारी वेदिके के बैनर तले आयोजित इस विरोध प्रदर्शन में न केवल किसान, बल्कि स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधि भी बड़ी संख्या में शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। किसानों ने हाथों में तख्तियां ली हुई थीं, जिन पर कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट का कड़ा विरोध किया गया था, जिसके आधार पर यह अधिसूचना तैयार की गई है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह विवाद केवल पर्यावरण संरक्षण बनाम विकास का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर लाखों किसानों की आजीविका और भूमि अधिकारों से जुड़ा है। यदि ESA अधिसूचना को बिना किसी संशोधन के लागू किया जाता है, तो कृषि गतिविधियों और बुनियादी ढांचे के विकास पर कड़े प्रतिबंध लग सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।

पर्यावरण संरक्षण और मानव अस्तित्व के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य है, अन्यथा स्थानीय समुदायों का असंतोष बड़े सामाजिक संकट का रूप ले सकता है।

इस विरोध प्रदर्शन में राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार करते हुए विभिन्न दलों के नेता एकजुट नजर आए। शिवमोग्गा सांसद बी.वाई. राघवेंद्र, पूर्व मंत्री अरागा ज्ञानेंद्र, सागर के विधायक बेलूर गोपाल कृष्णा और वेस्टर्न घाट्स रैथा सहकारी ओक्काटा के अध्यक्ष एम.आर. मंजुनाथ गौड़ा ने सभा को संबोधित किया। नेताओं ने राज्य सरकार से मांग की कि अधिसूचना लागू करने से पहले भूमि का गहन भौतिक सर्वेक्षण किया जाए ताकि मानव बस्तियों और खेती वाले क्षेत्रों को इसके दायरे से बाहर रखा जा सके।

एम.आर. मंजुनाथ गौड़ा ने पड़ोसी राज्य केरल का उदाहरण देते हुए कहा कि केरल ने भौतिक सर्वेक्षण के माध्यम से ESA के दायरे को सफलतापूर्वक कम किया है। कर्नाटक के किसानों ने भी इसी तरह की प्रक्रिया की मांग की है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यह केवल शुरुआत है और जल्द ही सागर, तिरथहल्ली और शिकारीपुर सहित जिले के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह के आंदोलन किए जाएंगे।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

पश्चिमी घाटों के संरक्षण के लिए कस्तूरीरंगन समिति का गठन किया गया था, जिसने पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए एक बड़े क्षेत्र को संवेदनशील घोषित करने की सिफारिश की थी। हालांकि, इस सिफारिश ने दशकों से कृषि प्रधान समुदायों और पर्यावरणविदों के बीच एक तीव्र बहस को जन्म दिया है।

क्या आप जानते हैं?: पश्चिमी घाट दुनिया के आठ सबसे महत्वपूर्ण 'हॉटस्पॉट' में से एक है, जो जैव विविधता के मामले में अत्यंत समृद्ध है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: किसान किस बात का विरोध कर रहे हैं?
उत्तर: किसान पश्चिमी घाटों के 20,668 वर्ग किमी क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की केंद्र सरकार की अधिसूचना का विरोध कर रहे हैं।

प्रश्न 2: किसानों की मुख्य मांग क्या है?
उत्तर: किसानों की मांग है कि भूमि का भौतिक सर्वेक्षण किया जाए और खेती योग्य भूमि व मानव बस्तियों को ESA के दायरे से बाहर रखा जाए।