एक दशक पुराने अध्ययन से पता चला है कि सुधौवाला में पशु शव डंपिंग साइट को बिजली की लाइनों से दूर स्थानांतरित करने से गिद्धों को करंट लगने से बचाया जा सका। यह संरक्षण प्रयासों की एक बड़ी जीत है।

  • बिजली की लाइनों के पास शव डंपिंग से गिद्धों की मौत का खतरा बढ़ जाता है।
  • सुधौवाला में डंपिंग साइट को 2.4 किमी दूर स्थानांतरित करने से मृत्यु दर में कमी आई।
  • हिमालयी ग्रिफॉन और यूरेशियाई ग्रिफॉन जैसे प्रजातियां सबसे अधिक प्रभावित थीं।
  • यह मॉडल अन्य क्षेत्रों में भी संरक्षण के लिए अपनाया जा सकता है।

उत्तराखंड के देहरादून के पास रहने वाले गिद्धों के लिए जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर मात्र 2.4 किलोमीटर का साबित हुआ है। हाल ही में 'जर्नल ऑफ थ्रेटेन्ड टैक्स' में प्रकाशित एक दशक पुराने अध्ययन ने खुलासा किया है कि सुधौवाला क्षेत्र में बिजली की हाई-टेंशन लाइनों के पास स्थित पशु शव डंपिंग साइट को स्थानांतरित करना एक अत्यंत सफल कदम रहा है।

गिद्धों के लिए अस्तित्व का संकट केवल विषाक्तता या भोजन की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि बिजली के बुनियादी ढांचे से होने वाला करंट लगना (Electrocution) एक छिपा हुआ और घातक खतरा बनकर उभरा है। अध्ययन के अनुसार, 2011 से 2014 के बीच किए गए सर्वेक्षणों में 5 विभिन्न प्रजातियों के 743 गिद्धों का डेटा दर्ज किया गया था, जिनमें से 46 गिद्धों की मौत बिजली के तारों के संपर्क में आने से हुई थी।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि पारिस्थितिकी तंत्र में गिद्धों की भूमिका महत्वपूर्ण है क्योंकि वे मृत जीवों को खाकर बीमारियों के प्रसार को रोकते हैं। यदि ये 'प्राकृतिक सफाईकर्मी' बिजली के झटकों के कारण समाप्त हो जाते हैं, तो इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य और महामारी नियंत्रण पर पड़ेगा।

पशु शव डंपिंग साइटों को खतरनाक बिजली बुनियादी ढांचे से दूर ले जाना गिद्धों की मृत्यु दर को कम करने के लिए एक व्यावहारिक और प्रभावी उपाय हो सकता है।

अध्ययन में पाया गया कि मृत्यु दर का सबसे उच्च अनुपात हिमालयी ग्रिफॉन (Gyps himalayensis), उसके बाद यूरेशियाई ग्रिफॉन (Gyps fulvus) और सिनेरियस गिद्ध (Aegypius monachus) में देखा गया। अप्रैल 2015 में स्थानीय अधिकारियों ने इस डंपिंग साइट को जोखिम वाले क्षेत्र से 2.4 किमी दूर स्थानांतरित कर दिया, जिसके बाद से निगरानी में बिजली से होने वाली मौतों के कोई मामले दर्ज नहीं किए गए हैं।

यह सफलता न केवल गिद्धों के लिए बल्कि ब्लैक काइट और क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल जैसे अन्य शिकारी पक्षियों के लिए भी सुरक्षा कवच साबित हुई है। वन्यजीव संस्थान ऑफ इंडिया (WII) के विशेषज्ञों का मानना है कि इस दृष्टिकोण को देश के अन्य प्रभावित क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है।

Did You Know?: गिद्धों को 'प्रकृति का सफाईकर्मी' कहा जाता है क्योंकि वे मृत जानवरों के अवशेषों को खाकर संक्रमण और महामारियों को फैलने से रोकते हैं।

Frequently Asked Questions

1. गिद्धों के लिए बिजली की लाइनें क्यों खतरनाक हैं?
गिद्ध भोजन (मृत पशु शव) की तलाश में बिजली के खंभों और तारों के पास आते हैं, जिससे उनके करंट लगने और मरने की संभावना बढ़ जाती है।

2. क्या डंपिंग साइट बदलना वास्तव में प्रभावी रहा?
हाँ, सुधौवाला में साइट को 2.4 किमी दूर ले जाने के बाद से बिजली से होने वाली गिद्धों की मौतों में उल्लेखनीय कमी देखी गई है।