भारत अपने समुद्री मछली स्टॉक को मौद्रिक मूल्य प्रदान करके अपनी समुद्री संपदा को मापने की दिशा में बढ़ रहा है। यह पहल नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) को सुरक्षित करने और जलवायु जोखिमों के प्रबंधन के लिए की गई है।

  • भारत समुद्री मछली संसाधनों को आर्थिक संपत्ति के रूप में valuing करने के लिए UN के SEEA ढांचे को अपना रहा है।
  • नीली अर्थव्यवस्था वर्तमान में भारत के GDP में लगभग 4% का योगदान देती है और 3 करोड़ लोगों को आजीविका प्रदान करती है।
  • भारत अब अमेरिका, नॉर्वे और कनाडा जैसे चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया है जो प्राकृतिक पूंजी को राष्ट्रीय खातों में एकीकृत कर रहे हैं।

भारत की टिकाऊ नीली अर्थव्यवस्था एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने देश के समुद्री मछली संसाधनों के मूल्य निर्धारण का एक महत्वपूर्ण सांख्यिकीय प्रयोग शुरू किया है। संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण-आर्थिक लेखांकन प्रणाली (SEEA) के आधार पर तैयार किया गया यह दृष्टिकोण भारत के प्राकृतिक संसाधनों को मापने के तरीके में एक बड़ा बदलाव है।

विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश होने के नाते, भारत अपने विशेष आर्थिक क्षेत्रों (EEZs) में मौजूद मछली स्टॉक को मौद्रिक मूल्य दे रहा है। सरल शब्दों में, समुद्र में मौजूद मछलियां एक 'प्राकृतिक पूंजी संपत्ति' हैं, और साल भर में पकड़ी गई मछलियां उस संपत्ति से मिलने वाला 'आर्थिक लाभ' हैं। यह अंतर यह समझने के लिए आवश्यक है कि क्या हम अपनी प्राकृतिक संपत्ति का अत्यधिक दोहन कर रहे हैं।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि पारंपरिक GDP आंकड़े प्राकृतिक संपत्तियों के क्षरण को नहीं दिखाते हैं। समुद्र के मौद्रिक मूल्य को निर्धारित करके, सरकार बंदरगाह विस्तार, पर्यटन और अपतटीय ऊर्जा जैसे प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों के बीच बेहतर संतुलन बना सकती है। यह ढांचा समुद्र को केवल तत्काल कमाई के स्रोत के रूप में नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक निवेश पोर्टफोलियो के रूप में देखने में मदद करेगा।

जैविक संपत्तियों को राष्ट्रीय बैलेंस शीट में एकीकृत करना ही एकमात्र तरीका है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि आर्थिक विकास पारिस्थितिक दिवालियापन की कीमत पर न हो।

इस क्षेत्र का पैमाना विशाल है। वित्त वर्ष 2025 में कुल मछली उत्पादन 19.77 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) रहा, जिसमें समुद्री क्षेत्र का योगदान महत्वपूर्ण था। इस क्षेत्र का कुल मूल्य ₹1.76 लाख करोड़ आंका गया है। भारत के समुद्री उत्पाद 130 अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात किए जाते हैं, जिनका मूल्य ₹62,408.45 करोड़ है।

इस महत्वाकांक्षी योजना को वित्तीय समर्थन भी मिल रहा है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) इस विकास का मुख्य स्तंभ है, जिसके लिए नवीनतम केंद्रीय बजट में ₹2,761.8 करोड़ का प्रावधान किया गया है। भारत की 11,100 किमी लंबी तटरेखा और 2 मिलियन वर्ग किमी से अधिक के EEZ के साथ, 2030 तक 100 बिलियन डॉलर की नीली अर्थव्यवस्था का लक्ष्य रखा गया है।

मापदंडवित्त वर्ष 2013-14वित्त वर्ष 2024-25
समुद्री मछली उत्पादन34.43 लाख टन46.15 लाख टन
वैश्विक उत्पादन हिस्सेदारी-8%
निर्यात बाजार-130 देश

हालांकि, नीति आयोग ने चेतावनी दी है कि EEZ की संसाधन क्षमता 7.16 MMT है, लेकिन गहरे समुद्र के संसाधन अत्यधिक दोहन के प्रति संवेदनशील हैं। यह नया लेखांकन प्रयोग यह तय करने में मदद करेगा कि भारत को मछली पकड़ने की क्षमता बढ़ानी चाहिए या स्टॉक की बहाली पर ध्यान देना चाहिए।

क्या आप जानते हैं?: भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से एक है जो जलीय संसाधनों के मौद्रिक लेखांकन का प्रयास कर रहे हैं, क्योंकि मछलियों की गतिशीलता के कारण उन्हें मापना जंगलों या खनिजों की तुलना में कहीं अधिक कठिन है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: SEEA ढांचा क्या है?
SEEA एक अंतरराष्ट्रीय मानक है जो पर्यावरण डेटा को आर्थिक खातों के साथ जोड़ता है ताकि देश की कुल संपत्ति का समग्र विवरण मिल सके।

प्रश्न 2: इससे आम मछुआरों को क्या लाभ होगा?
यद्यपि यह एक सांख्यिकीय प्रयोग है, लेकिन इससे संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन और स्टॉक बहाली के लिए बेहतर सरकारी फंडिंग सुनिश्चित होगी, जिससे दीर्घकालिक आजीविका सुरक्षित होगी।