विषाक्त दवाओं के कारण आबादी में भारी गिरावट झेलने के बाद, अब भारत के गिद्धों के सामने बिजली के बुनियादी ढांचे से करंट लगने का नया खतरा मंडरा रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह लापरवाही स्थानीय स्तर पर गिद्धों के विलुप्त होने का कारण बन सकती है।

  • गिद्धों के बड़े पंखों के फैलाव और उनके बैठने की आदतों के कारण बिजली का झटका लगने का खतरा बढ़ गया है।
  • ऐतिहासिक रूप से 99.5% आबादी की गिरावट डिक्लोफेनाक दवा के कारण हुई थी, लेकिन अब इंफ्रास्ट्रक्चर नया खतरा है।
  • हाई-टेंशन लाइनों के पास पशु शवों के डंपिंग यार्ड होने से पक्षियों की मृत्यु दर बढ़ जाती है।
  • कंडक्टर्स का इंसुलेशन और फीडिंग साइट्स को दूर करना इस समस्या का प्रभावी समाधान हो सकता है।

दशकों तक, भारत में गिद्धों के संरक्षण का मुख्य संघर्ष रासायनिक विषाक्तता के खिलाफ था। 1990 के दशक में, भारत ने वन्यजीवों के इतिहास में सबसे विनाशकारी गिरावट देखी, जिसमें 2007 तक गिद्धों की आबादी 99.5% तक गिर गई। इसका मुख्य कारण डिक्लोफेनाक (Diclofenac) था, जो पशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाली एक दर्द निवारक दवा थी और गिद्धों की किडनी को पूरी तरह नष्ट कर देती थी। हालांकि सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन अब एक नया खतरा सामने आया है: देश का तेजी से फैलता बिजली ग्रिड।

गिद्धों की शारीरिक बनावट उन्हें बिजली के खतरों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है। उनके पंखों का फैलाव इतना अधिक होता है कि एक बड़ा गिद्ध एक साथ दो बिजली के तारों को छू सकता है, जिससे सर्किट पूरा हो जाता है और उन्हें तुरंत बिजली का झटका लगता है। इसके अलावा, गिद्धों की आदत ऊंचे ढांचों पर बैठने की होती है, जो अक्सर बिजली के खंभों के साथ मेल खाते हैं।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि गिद्धों का नुकसान केवल एक पर्यावरणीय त्रासदी नहीं है, बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट भी है। जब गिद्ध गायब होते हैं, तो मृत पशुओं के शव लंबे समय तक खुले रहते हैं, जिससे आवारा कुत्तों की आबादी बढ़ती है। यह श्रृंखला रेबीज और अन्य जूनोटिक बीमारियों के प्रकोप को जन्म देती है। अमेरिकन इकोनॉमिक रिव्यू के 2024 के एक अध्ययन के अनुसार, इससे मानव मृत्यु दर में 4% की वृद्धि हुई और भारत को सालाना लगभग $69.4 बिलियन का नुकसान हुआ।

गिद्धों की वर्तमान आबादी इतनी नाजुक है कि केवल बिजली के झटकों से होने वाली मृत्यु भी स्थानीय आबादी को पूरी तरह विलुप्त कर सकती है।

हालिया आंकड़े स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। 2025 के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि गिद्ध अब अपने ऐतिहासिक घोंसलों के केवल 50% स्थानों पर ही रह रहे हैं। जर्नल ऑफ थ्रेटन टैक्सोनोमी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, उत्तराखंड के देहरादून में हाई-टेंशन लाइनों से केवल 2.4 किमी दूर शव डंपिंग साइट को स्थानांतरित करने से इन पक्षियों की जान बचाई जा सकती है। बिजली प्रतिष्ठानों के पास भोजन का कचरा फेंकने से गिद्ध अनजाने में 'डेथ ट्रैप' में फंस जाते हैं।

यह समस्या केवल हाई-वोल्टेज लाइनों तक सीमित नहीं है। राज्य जलवायु लचीला बिजली प्रणाली विकास परियोजना के आकलन से पता चला है कि मध्यम-वोल्टेज लाइनों पर भी मिस्र के गिद्ध और स्टेपी ईगल जैसे पक्षी अपनी जान गंवा रहे हैं। एक बड़ी चुनौती यह है कि इन मौतों का दस्तावेजीकरण बहुत कम होता है, क्योंकि शवों को या तो इंसान हटा देते हैं या अन्य शिकारी जानवर खा जाते हैं।

खतरे का कारक रासायनिक (NSAIDs) बुनियादी ढांचा (करंट)
मुख्य कारण डिक्लोफेनाक विषाक्तता इलेक्ट्रिकल शॉर्ट सर्किट
प्रभाव का पैमाना राष्ट्रीय स्तर पर भारी गिरावट (99.5%) स्थानीय विलुप्ति का जोखिम
समाधान दवाओं पर कानूनी प्रतिबंध इंसुलेशन और साइट प्रबंधन

इस खतरे को कम करने के लिए विशेषज्ञ बहु-आयामी दृष्टिकोण का सुझाव देते हैं। इसमें कंडक्टर्स का इंसुलेशन करना, बिजली के सक्रिय और ग्राउंडेड घटकों के बीच की दूरी बढ़ाना और सुरक्षित बैठने के स्थान बनाना शामिल है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भोजन के स्रोतों को बिजली के बुनियादी ढांचे से अलग किया जाए, जो एक कम लागत वाला और प्रभावी समाधान है।

क्या आप जानते हैं?: गिद्ध प्रकृति के सबसे कुशल 'सफाई कर्मचारी' होते हैं; एक अकेला गिद्ध किसी शव को अन्य शिकारियों की तुलना में बहुत कम समय में साफ कर सकता है, जिससे एंथ्रैक्स जैसी बीमारियों का प्रसार रुकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: गिद्धों को छोटे पक्षियों की तुलना में बिजली का झटका लगने का खतरा अधिक क्यों होता है?
अपने पंखों के विशाल फैलाव के कारण, गिद्ध गलती से दो लाइव तारों या एक तार और खंभे के बीच संपर्क बना लेते हैं, जो छोटे पक्षी नहीं कर पाते।

प्रश्न 2: गिद्धों की कमी से मानव स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
गिद्धों की अनुपस्थिति में मृत पशुओं के शव नहीं हट पाते, जिससे आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ती है और रेबीज जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।