संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने एक विस्तृत 'ओवरशूट, पीक एंड डिक्लाइन' मार्ग का अनावरण किया है। इसका उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को यथासंभव कम शिखर तक ले जाना और फिर सदी के अंत तक 1.5°C की सीमा से नीचे लाना है, जिसे 'सर्वश्रेष्ठ शेष विकल्प' बताया गया है।

  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने 1.5°C वैश्विक तापमान वृद्धि सीमा के उल्लंघन के प्रबंधन के लिए एक विस्तृत 'ओवरशूट, पीक एंड डिक्लाइन' मार्ग प्रस्तुत किया है।
  • यह मार्ग स्वीकार करता है कि 1.5°C सीमा का उल्लंघन अब अपरिहार्य है, लेकिन इसका लक्ष्य तापमान वृद्धि को यथासंभव निम्नतम शिखर पर रखना और फिर सदी के अंत तक इसे 1.5°C से नीचे लाना है।
  • रिपोर्ट में वर्तमान नीतियों के तहत 2100 तक 2.6°C (1.9–3.6°C की सीमा में) तापमान वृद्धि का अनुमान लगाया गया है, जो पेरिस समझौते के लक्ष्यों से काफी ऊपर है।
  • कार्बन बजट तेजी से समाप्त हो रहा है, जिससे 2025 में COP30 में 1.5°C सीमा के अस्थायी उल्लंघन की संभावना को स्वीकार किया गया।
  • तापमान 1.5°C से ऊपर रहने पर समुद्र-स्तर में वृद्धि, प्रवाल भित्तियों का पतन, ग्लेशियरों का बड़े पैमाने पर नुकसान और खाद्य उत्पादन में गिरावट जैसी अपरिवर्तनीय लागतें आएंगी।
  • उत्सर्जन में कटौती के अलावा, वनों की कटाई को रोकना और बड़े पैमाने पर वनीकरण जैसे प्रकृति-आधारित समाधानों की तत्काल आवश्यकता है।
  • मीथेन उत्सर्जन में कटौती को निकट अवधि में वार्मिंग को धीमा करने का सबसे प्रभावी तरीका बताया गया है।

पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति

नई दिल्ली - बुधवार, 2 सितंबर 2026 को, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने एक अभूतपूर्व रिपोर्ट जारी की, जिसमें वैश्विक जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए एक नया मार्ग सुझाया गया है। रिपोर्ट, जिसका शीर्षक 'Limiting Overshoot' है, स्वीकार करती है कि पेरिस समझौते का मुख्य लक्ष्य - वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 1.5°C ऊपर सीमित करना - अब अपरिहार्य रूप से उल्लंघन होने वाला है। UNEP ने पहली बार एक विस्तृत 'ओवरशूट, पीक एंड डिक्लाइन' (उल्लंघन, शिखर और गिरावट) मार्ग का प्रस्ताव दिया है। इस मार्ग का उद्देश्य तापमान वृद्धि को यथासंभव कम शिखर तक ले जाना और फिर सदी के अंत तक इसे 1.5°C की सीमा से नीचे लाना है। यह कदम जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में एक महत्वपूर्ण मोड़ का प्रतीक है, जो स्वीकार करता है कि तत्काल और निर्णायक कार्रवाई के बिना, हम इस महत्वपूर्ण सीमा को पार कर जाएंगे।

1.5°C सीमा का उल्लंघन: अपरिहार्यता और परिणाम

रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान वैश्विक नीतियां 2100 तक तापमान में लगभग 2.6°C की वृद्धि की ओर इशारा करती हैं, जिसकी सीमा 1.9°C से 3.6°C तक है। यहां तक कि सभी देशों द्वारा अपने राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं और शुद्ध-शून्य लक्ष्यों को पूरा करने पर भी, शिखर वार्मिंग 1.8°C तक पहुंचने का अनुमान है। UNEP ने चेतावनी दी है कि 1.5°C की सीमा को पार करने से ऐसे अपरिवर्तनीय नुकसान होंगे जिन्हें कोई भी अनुकूलन पहल पूर्ववत नहीं कर सकती। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1.5°C की सीमा का उल्लंघन 'किसी भी तरह से स्वीकार्य या पसंदीदा मार्ग नहीं है; यह केवल सबसे अच्छा शेष विकल्प है'। यह गंभीर मूल्यांकन 2025 में ब्राजील के बेलेम में आयोजित 30वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP30) के कूटनीतिक आधार पर आधारित है, जहां 'ग्लोबल मुटिराओ' निर्णय में पहली बार यह स्वीकार किया गया कि 1.5°C की सीमा का अस्थायी उल्लंघन संभव है, क्योंकि शेष कार्बन बजट तेजी से समाप्त हो रहा है।

क्यों यह मायने रखता है

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि UNEP की यह रिपोर्ट केवल एक तकनीकी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन की गंभीरता और इससे निपटने के लिए आवश्यक साहसिक, अपरंपरागत रणनीतियों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है। यह स्वीकार करना कि 1.5°C सीमा का उल्लंघन अपरिहार्य है, एक कठिन सत्य है, लेकिन यह वैश्विक समुदाय को एक यथार्थवादी, यद्यपि चुनौतीपूर्ण, योजना के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी प्रदान करता है। इस रिपोर्ट का वैश्विक नीति-निर्माण, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और भविष्य की जलवायु कार्रवाई पर गहरा प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि यह स्पष्ट करती है कि केवल उत्सर्जन में कटौती ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि कार्बन हटाने की प्रौद्योगिकियों और रणनीतियों में भी भारी निवेश की आवश्यकता होगी।

बढ़ती लागतें और अपरिवर्तनीय क्षति

रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि 1.5°C से ऊपर बिताया गया प्रत्येक क्षण 'बढ़ती लागतों' को जन्म देगा। इनमें समुद्र-स्तर में तेजी से वृद्धि, प्रवाल भित्तियों का विनाश, 2100 तक वैश्विक द्रव्यमान के एक चौथाई से अधिक ग्लेशियरों का नुकसान, 2050 तक प्रभावी अनुकूलन के बिना वैश्विक खाद्य उत्पादन में 14% तक की गिरावट, और पश्चिम अंटार्कटिक और ग्रीनलैंड आइस शीट्स, अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन और अमेज़ॅन में अपरिवर्तनीय टिपिंग पॉइंट्स की बढ़ती संभावना शामिल है। यह भी बताया गया है कि उत्सर्जित कार्बन की एक टन के प्रभाव को पूर्ववत करना कठिन होता जाता है। रिपोर्ट का अनुमान है कि उच्च उत्सर्जन के प्रत्येक पांच साल की अवधि में शिखर वार्मिंग में लगभग 0.1°C की वृद्धि होती है। इस 0.1°C को उलटने के लिए, जो भी उत्सर्जन अभी भी हो रहा है, उसके अलावा वायुमंडल से लगभग 220 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड को हटाना होगा। एक औसत पेड़ अपने जीवनकाल में केवल लगभग एक टन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है, जो इस चुनौती की विशालता को दर्शाता है।

कार्बन हटाना: एक आवश्यक पूरक

रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि कार्बन डाइऑक्साइड हटाना (CDR) उत्सर्जन में कटौती के अतिरिक्त है, न कि उसके विकल्प के रूप में। यह तभी विश्वसनीय रूप से तापमान को 1.5°C की सीमा तक वापस ला सकता है जब शिखर वार्मिंग 2°C से काफी नीचे रहे। उत्सर्जन में कटौती के सबसे आशावादी पैमाने पर भी इस सदी में केवल कुछ अंशों की डिग्री को उलटने की संभावना है। UNEP की कार्यकारी निदेशक, इंगर एंडरसन ने स्पष्ट किया कि यह रिपोर्ट कोई रियायत नहीं है। उन्होंने कहा, “चलिए बहुत स्पष्ट रहें, 1.5°C का लक्ष्य अभी भी लक्ष्य है। लेकिन अब हमें इसे ऊपर से अलग तरीके से अपनाना होगा।”

वैश्विक संदर्भ और चुनौतियाँ

यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब देशों के उत्सर्जन में कटौती करने की इच्छाशक्ति पर अनिश्चितता छाई हुई है। दुनिया का सबसे बड़ा ऐतिहासिक उत्सर्जक, संयुक्त राज्य अमेरिका, ने हाल ही में पेरिस समझौते से औपचारिक रूप से बाहर निकलने की घोषणा की है और संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC), इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) और ग्रीन क्लाइमेट फंड से भी अपने हटने की घोषणा की है। इसके अतिरिक्त, पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति में सबसे बड़ी बाधा उत्पन्न हुई है, जिससे प्रभावित देशों का उत्पादन 14 मिलियन बैरल प्रतिदिन से अधिक कम हो गया है। ऊर्जा की कीमतों में लगातार वृद्धि सरकारों को कोयले और अन्य अल्पकालिक जीवाश्म ईंधन प्रतिक्रियाओं की ओर धकेल सकती है।

मीथेन लक्ष्य और अन्य महत्वपूर्ण बिंदु

UNEP रिपोर्ट में मीथेन पर महत्वपूर्ण जोर दिया गया है, जो वर्तमान में लगभग 0.5°C वार्मिंग में योगदान देता है। मानव गतिविधि वर्तमान में प्रति वर्ष लगभग 500 मिलियन टन मीथेन का उत्सर्जन करती है। निकट अवधि में वार्मिंग को धीमा करने के लिए मीथेन को कम करना सबसे प्रभावी तरीका बताया गया है। रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर वनीकरण कार्यक्रमों जैसे प्रकृति-आधारित समाधानों की भी आवश्यकता पर बल दिया गया है।

क्या आप जानते हैं?: 1.5°C की सीमा का उल्लंघन वैश्विक खाद्य उत्पादन में 2050 तक 14% तक की गिरावट ला सकता है, यदि प्रभावी अनुकूलन उपाय नहीं किए गए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या 1.5°C का लक्ष्य अभी भी प्राप्त किया जा सकता है?

UNEP की रिपोर्ट के अनुसार, 1.5°C की सीमा का अस्थायी उल्लंघन अब अपरिहार्य माना जा रहा है। हालांकि, रिपोर्ट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तापमान वृद्धि को यथासंभव कम शिखर तक रखा जाए और सदी के अंत तक इसे 1.5°C से नीचे लाया जाए। इसलिए, लक्ष्य अभी भी 1.5°C पर वापस आना है, लेकिन एक अलग, 'ऊपर से' दृष्टिकोण के साथ।

2. 'ओवरशूट, पीक एंड डिक्लाइन' मार्ग का क्या मतलब है?

'ओवरशूट, पीक एंड डिक्लाइन' मार्ग का अर्थ है कि वैश्विक तापमान पहले 1.5°C की सीमा को पार करेगा (ओवरशूट), फिर एक निश्चित बिंदु पर अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचेगा (पीक), और उसके बाद सदी के अंत तक या उससे पहले 1.5°C की सीमा से नीचे वापस आ जाएगा (डिक्लाइन)। यह मार्ग उत्सर्जन में भारी कटौती और कार्बन हटाने की तकनीकों के बड़े पैमाने पर उपयोग पर निर्भर करता है।