केंद्र सरकार द्वारा पश्चिमी घाट के बड़े हिस्सों को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने के सातवें मसौदे ने स्थानीय निवासियों और किसानों के बीच डर पैदा कर दिया है। कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर आधारित इस प्रस्ताव के खिलाफ शिवमोगा में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं।
- केंद्र सरकार ने पश्चिमी घाट के लिए सातवां ईको-सेंसिटिव ज़ोन (ESA) मसौदा जारी किया है।
- कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर आधारित इस प्रस्ताव का स्थानीय किसानों और निवासियों द्वारा कड़ा विरोध किया जा रहा है।
- शिवमोगा के होसनागर में किसानों ने भूमि सर्वेक्षण और मानव बस्तियों को बाहर रखने की मांग को लेकर मार्च निकाला।
- विवाद का इतिहास दशकों पुराना है, जो 1987 के प्रसिद्ध 'पश्चिमी घाट मार्च' से जुड़ा है।
पश्चिमी घाट के निवासी एक बार फिर अनिश्चितता और भय के दौर से गुजर रहे हैं। 27 जुलाई, 2026 को केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए सातवें मसौदे ने, जो कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर आधारित है, इस क्षेत्र के बड़े हिस्सों को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने का प्रस्ताव दिया है। इस अधिसूचना के खिलाफ आपत्ति दर्ज करने के लिए 60 दिनों का समय दिया गया है, लेकिन इससे पहले ही स्थानीय समुदायों में भारी आक्रोश फैल गया है।
हाल ही में, 29 अगस्त को शिवमोगा जिले के होसनागर तालुक में सैकड़ों किसानों ने एक विशाल विरोध मार्च निकाला। यह मार्च करनिगिरी के गणेश मंदिर से शुरू होकर होसनागर शहर तक गया। किसानों की मुख्य मांग है कि कर्नाटक सरकार भूमि का भौतिक सर्वेक्षण कराए और प्रस्तावित ESA सीमाओं से मानव बस्तियों एवं खेती योग्य भूमि को पूरी तरह से बाहर रखा जाए।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मुद्दा केवल पर्यावरण संरक्षण का नहीं है, बल्कि यह आजीविका और भूमि अधिकारों का भी है। यदि ये नियम लागू होते हैं, तो स्थानीय समुदायों के विकास और कृषि गतिविधियों पर गंभीर प्रतिबंध लग सकते हैं, जो क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक संरचना को बदल सकता है।
पश्चिमी घाट का संरक्षण और स्थानीय लोगों का अधिकार—इन दोनों के बीच संतुलन बनाना ही इस संकट का एकमात्र समाधान है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: संघर्ष की जड़ें
इस विवाद की जड़ें दशकों पुरानी हैं। 1 नवंबर, 1987 को वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के दो समूहों ने महाराष्ट्र के धुले से लेकर तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक एक लंबी पैदल यात्रा की थी। इसका उद्देश्य पश्चिमी घाट की पारिस्थितिक स्थिति का दस्तावेजीकरण करना था। इसके बाद 2010 में माधव गाडगिल की अध्यक्षता में 'पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल' (WGEEP) का गठन किया गया था।
गाडगिल रिपोर्ट ने एक 'जन-उन्मुख विकास मॉडल' का सुझाव दिया था, जिसमें किसानों को पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए भुगतान करने की बात कही गई थी। हालांकि, राज्य सरकारों के विरोध के बाद, सरकार ने के. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय कार्य समूह बनाया, जिसने 2013 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने लगभग 37% क्षेत्र को ESA घोषित करने की सिफारिश की थी, जिसमें कर्नाटक का हिस्सा सबसे बड़ा है।
| विशेषता | गाडगिल रिपोर्ट (WGEEP) | कस्तूरीरंगन रिपोर्ट (HLWG) |
|---|---|---|
| दृष्टिकोण | जन-केंद्रित और पारिस्थितिकी सेवा भुगतान | कार्यान्वयन योग्य और सीमित प्रतिबंध |
| ESA क्षेत्र | अधिक व्यापक संरक्षण | लगभग 37% क्षेत्र का प्रस्ताव |
| मुख्य फोकस | समुदाय आधारित प्रबंधन | नियमन और विकास का संतुलन |
वर्तमान प्रस्ताव के तहत खनन, रेत निष्कर्षण और 20,000 वर्ग मीटर से अधिक के निर्माण कार्यों पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाने की संभावना है। स्थानीय निवासी इसे अपनी प्रगति में एक बड़ी बाधा के रूप में देख रहे हैं।
Frequently Asked Questions
1. ESA क्या है?
ESA का अर्थ है पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र, जहाँ पर्यावरण की रक्षा के लिए मानवीय गतिविधियों पर नियंत्रण लगाया जाता है।
2. किसानों की मुख्य मांग क्या है?
किसान चाहते हैं कि खेती वाली भूमि और बस्तियों को इन प्रतिबंधों से मुक्त रखा जाए और जमीन का सटीक सर्वेक्षण किया जाए।