कोयंबटूर के एक अभिनव प्रयास ने गणेश चतुर्थी को पर्यावरण के अनुकूल बना दिया है। 'सीड गणेश' मूर्तियों में बीज और अनाज भरे होते हैं, जो विसर्जन के बाद पौधों के रूप में जीवन पाते हैं।
- 'सीड गणेश' मूर्तियों में सब्जी और अनाज के बीज भरे होते हैं।
- विसर्जन के बाद, ये मूर्तियाँ मिट्टी में बदलकर पौधों के रूप में उग आती हैं।
- यह पहल प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) से होने वाले जल प्रदूषण को कम करने के लिए है।
- बड़े आकार की मूर्तियों में अनाज भरा जाता है जो मछलियों और पक्षियों का भोजन बनता है।
गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर, कोयंबटूर के कारीगर और सामाजिक कार्यकर्ता एक ऐसी परंपरा को जन्म दे रहे हैं जो न केवल श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है। स्वराजित अलाकानंदा और उनके एनजीओ 'सो अवेयर' (So Aware) ने 'सीड गणेश' की अवधारणा पेश की है, जो पारंपरिक मूर्तियों के बजाय शुद्ध मिट्टी से बनी होती हैं और जिनके भीतर जीवन के बीज छिपे होते हैं।
इस नवाचार की शुरुआत 2017 में हुई थी, जब स्वराजित ने जल निकायों में रंगीन और रासायनिक मूर्तियों के विसर्जन से होने वाले नुकसान को देखा। उन्होंने स्थानीय कुम्हारों के साथ मिलकर ऐसी मूर्तियाँ तैयार कीं, जिन्हें घर पर ही एक बाल्टी में विसर्जित किया जा सकता है। जैसे ही मिट्टी घुलती है, उसके भीतर मौजूद बीज अंकुरित होने लगते हैं, जिससे परिवार के लिए ताजी सब्जियाँ प्राप्त होती हैं।
क्यों है यह महत्वपूर्ण?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि पारंपरिक प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) की मूर्तियाँ जल निकायों के पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुँचाती हैं। 'सीड गणेश' न केवल प्रदूषण को रोकते हैं, बल्कि जैव विविधता को बढ़ावा भी देते हैं। जब लोग इन मूर्तियों को विसर्जित करते हैं, तो वे वास्तव में प्रकृति को वापस लौटा रहे होते हैं।
"हमारा मूल दर्शन मिट्टी से जो लिया गया है, उसे वापस मिट्टी को ही लौटाना है।" - स्वराजित अलाकानंदा
इन मूर्तियों के निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत सूक्ष्म है। मूर्तियों को बिना किसी हानिकारक रसायनों के, केवल हाथों से तराशा जाता है। लगभग 30 दिनों तक छाया में सुखाने के बाद, इनके पीछे एक छोटा छेद किया जाता है जिसमें छात्र स्वयंसेवक भिंडी, टमाटर, बीन्स, बैंगन, मूली, तुलसी और खीरे जैसे बीजों को भरते हैं। इसके साथ ही खाद और लाल मिट्टी भी डाली जाती है ताकि पौधों को पोषण मिल सके।
बड़े आकार की मूर्तियों (2.5 फीट तक) के लिए एक अलग रणनीति अपनाई जाती है। इनमें गेहूं, सूजी, मक्का और पोहा भरा जाता है। जब इन्हें तालाबों या झीलों में विसर्जित किया जाता है, तो ये अनाज मछलियों और पक्षियों के लिए पौष्टिक आहार का काम करते हैं, जिससे जलीय जीवन को सहायता मिलती है।
Frequently Asked Questions
1. क्या इन मूर्तियों को घर पर विसर्जित किया जा सकता है?
हाँ, इन्हें घर पर ही एक बाल्टी पानी में विसर्जित किया जा सकता है और बाद में मिट्टी को गमले में डाल सकते हैं।
2. क्या ये मूर्तियाँ वास्तव में पौधे उगाती हैं?
बिल्कुल, इनमें प्राकृतिक बीज और खाद का मिश्रण होता है जो विसर्जन के बाद अंकुरण में मदद करता है।