संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नवीनतम रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि अब अपरिहार्य है। यह रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में एक गंभीर मोड़ को दर्शाती है।
- वैश्विक तापमान का 1.5°C की सीमा को पार करना अब अपरिहार्य (Unavoidable) हो गया है।
- सर्वोत्तम परिस्थितियों में भी तापमान 1.8°C तक जा सकता है, जबकि अधिकांश अनुमान इसे 2°C से ऊपर देखते हैं।
- तापमान बढ़ने से अमेज़न वर्षावन के विनाश और ग्लेशियरों के पिघलने जैसे अपरिवर्तनीय जोखिम बढ़ गए हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नवीनतम रिपोर्ट, जिसका शीर्षक 'लिमिटिंग ओवरशूट' (Limiting Overshoot) है, ने दुनिया को एक कड़वी सच्चाई से रूबरू कराया है। रिपोर्ट में पहली बार आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया गया है कि पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रखना अब संभव नहीं रह गया है। यह स्वीकारोक्ति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब तक IPCC जैसी संस्थाएं एक बहुत ही संकीर्ण अवसर की उम्मीद जगाए हुए थीं।
तापमान का 1.5°C लक्ष्य क्यों महत्वपूर्ण था?
जलवायु विज्ञान में 1.5°C की सीमा को एक 'सुरक्षा रेखा' के रूप में देखा जाता था। पेरिस समझौते (2015) के तहत 193 देशों ने इस लक्ष्य को प्राप्त करने का संकल्प लिया था क्योंकि 2°C की तुलना में 1.5°C पर अत्यधिक गर्मी, सूखे और जल संकट के जोखिम काफी कम होते हैं। येल अर्थशास्त्री विलियम नॉर्डहॉस ने पहले ही चेतावनी दी थी कि 2°C से अधिक की वृद्धि मानव सभ्यता के रहने योग्य वातावरण को पूरी तरह बदल सकती है।
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह रिपोर्ट केवल एक वैज्ञानिक चेतावनी नहीं है, बल्कि वैश्विक नीति निर्माताओं के लिए एक 'वेक-अप कॉल' है। अब मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि हम 1.5°C को कैसे रोकें, बल्कि यह है कि हम 'ओवरशूट' (सीमा पार करने) के बाद तापमान को वापस नीचे लाने के लिए क्या कदम उठाएंगे। यदि तापमान 2°C के पार चला गया, तो कार्बन डाइऑक्साइड हटाने (CDR) की लागत और जटिलता अत्यधिक बढ़ जाएगी।
"नेपाल में हालिया आपदाएं और भारत में 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने वाली लू इस बात का प्रमाण हैं कि जलवायु जोखिम अब भविष्य की बात नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता हैं।"
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि तापमान बढ़ने से अमेज़न रेनफॉरेस्ट का विनाश, पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना और अटलांटिक मेरिडियन ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) जैसे समुद्री धाराओं के तंत्र में गड़बड़ी आ सकती है। ये बदलाव अपरिवर्तनीय हो सकते हैं, जिसका अर्थ है कि एक बार नष्ट होने के बाद इन्हें वापस नहीं लाया जा सकेगा।
| मानक (Threshold) | प्रभाव (Impact) | जोखिम स्तर (Risk Level) |
|---|---|---|
| 1.5°C | गंभीर लेकिन प्रबंधनीय | मध्यम |
| 2.0°C | अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक तंत्र विनाश | उच्च/विनाशकारी |
प्रश्न 1: क्या 1.5°C पार होने का मतलब है कि दुनिया तुरंत खत्म हो जाएगी?
नहीं, यह कोई 'लाइट स्विच' नहीं है जिसे ऑन करते ही प्रलय आ जाए, बल्कि यह एक रक्षा रेखा है जिसके पार जाने पर जोखिम तेजी से बढ़ते हैं।
प्रश्न 2: 'ओवरशूट' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है तापमान का निर्धारित सीमा (1.5°C) से ऊपर जाना और फिर भविष्य में उत्सर्जन में कटौती और कार्बन रिमूवल के माध्यम से उसे वापस नीचे लाना।