भारत के जैव विविधता हॉटस्पॉट 'पश्चिमी घाट' को बचाने की कोशिशें विवादों में घिर गई हैं। कर्नाटक सरकार ने केंद्र के नए इको-सेंसिटिव एरिया (ESA) प्रस्ताव पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं।
- पश्चिमी घाट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जैव विविधता हॉटस्पॉट में से एक है।
- केंद्र सरकार ने कर्नाटक के 1,449 गांवों में 20,668 वर्ग किमी क्षेत्र को ईको-सेंसिटिव एरिया (ESA) घोषित करने का प्रस्ताव दिया है।
- कर्नाटक सरकार और स्थानीय प्रतिनिधियों ने इस प्रस्ताव और पिछले कस्तूरीरंगन रिपोर्ट का कड़ा विरोध किया है।
भारत की पर्वत श्रृंखलाओं में पश्चिमी घाट का स्थान हिमालय के बाद सबसे महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र अपनी अद्वितीय सुंदरता और स्थानिक प्रजातियों (Endemism) के लिए जाना जाता है, जिसने इसे वैश्विक स्तर पर एक जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में स्थापित किया है। हालांकि, हाल के वर्षों में यह क्षेत्र बार-बार पारिस्थितिक आपदाओं का केंद्र बना हुआ है, जिससे इसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए समय-समय पर कई प्रयास किए गए हैं। गाडगिल समिति और कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्टें इसी दिशा में उठाए गए कदम थे, लेकिन इन दोनों ही रिपोर्टों को जमीनी स्तर पर भारी विरोध का सामना करना पड़ा। विवाद का मुख्य कारण संरक्षण के कड़े नियमों और स्थानीय निवासियों के अधिकारों के बीच का टकराव रहा है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह केवल पर्यावरण बनाम विकास की लड़ाई नहीं है, बल्कि संघीय ढांचे के भीतर केंद्र और राज्य के बीच अधिकार क्षेत्र का विवाद भी है। जब केंद्र सरकार 20,668 वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र को इको-सेंसिटिव एरिया (ESA) घोषित करने का प्रयास करती है, तो इसका सीधा असर हजारों ग्रामीणों की आजीविका और बुनियादी ढांचे के विकास पर पड़ता है।
"पारिस्थितिक संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना ही पश्चिमी घाट को बचाने का एकमात्र स्थायी तरीका है।"
कर्नाटक के मुख्यमंत्री के राजनीतिक सचिव और विरजपेट (कोडगु) के विधायक एएस पोनन्ना ने 'इन फोकस' पॉडकास्ट में स्पष्ट किया कि कर्नाटक सरकार केंद्र के नवीनतम ड्राफ्ट नोटिफिकेशन से असहमत है। कोडगु जैसे क्षेत्रों में, जहां लोग प्रकृति के साथ गहराई से जुड़े हैं, वहां बाहरी थोपे गए नियम अक्सर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
पश्चिमी घाट का संरक्षण मुद्दा दशकों पुराना है। गाडगिल रिपोर्ट ने अत्यंत सख्त प्रतिबंधों की वकालत की थी, जिसे 'अत्यधिक' माना गया। इसके बाद कस्तूरीरंगन रिपोर्ट आई, जिसने कुछ ढील दी, लेकिन फिर भी वह स्थानीय लोगों को संतुष्ट नहीं कर पाई। वर्तमान ESA प्रस्ताव इसी संघर्ष की अगली कड़ी है।
| समिति/प्रस्ताव | मुख्य दृष्टिकोण | विरोध का कारण |
|---|---|---|
| गाडगिल रिपोर्ट | अत्यधिक सख्त संरक्षण | स्थानीय अधिकारों का हनन |
| कस्तूरीरंगन रिपोर्ट | संतुलित संरक्षण | सीमित विकास की अनुमति |
| नवीनतम ESA ड्राफ्ट | विशिष्ट क्षेत्र सीमांकन | गांवों और कृषि पर प्रभाव |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. ईको-सेंसिटिव एरिया (ESA) क्या होता है?
यह एक ऐसा क्षेत्र होता है जहाँ पर्यावरण की संवेदनशीलता के कारण कुछ विशेष गतिविधियों (जैसे खनन या भारी उद्योग) पर प्रतिबंध लगाया जाता है ताकि प्रकृति का संरक्षण हो सके।
2. कर्नाटक सरकार इस प्रस्ताव का विरोध क्यों कर रही है?
सरकार का मानना है कि यह प्रस्ताव 1,449 गांवों के निवासियों के दैनिक जीवन और विकास कार्यों को प्रभावित करेगा।