विशेषज्ञ और स्वयंसेवक मिलकर 'केरल बर्ड एटलस 2.0' के माध्यम से राज्य के पक्षी जीवन का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं, जो जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक बदलावों का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।
- केरल बर्ड एटलस 2.0 राज्य के 4,324 उप-कोशिकाओं (sub-cells) में पक्षियों की निगरानी कर रहा है।
- पक्षी प्रजातियों में बदलाव, विशेष रूप से मोर की बढ़ती संख्या, केरल के आर्द्र क्षेत्र से शुष्क क्षेत्र में बदलने का संकेत है।
- यह परियोजना नागरिक विज्ञान (Citizen Science) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें पेशेवर और शौकिया पक्षी प्रेमी शामिल हैं।
केरल की समृद्ध जैव विविधता अब एक व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन के दायरे में है। केरल बर्ड एटलस 2.0 केवल पक्षियों की गिनती करने का प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह राज्य की बदलती पारिस्थितिकी का एक विस्तृत दर्पण है। 2015 में शुरू हुए पहले संस्करण के बाद, जो 2021 में जारी हुआ था, अब इस दूसरे संस्करण के माध्यम से पिछले दशक के बदलावों का विश्लेषण किया जा रहा है।
इस पहल के राज्य समन्वयक और केरल कृषि विश्वविद्यालय के जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण विज्ञान कॉलेज के डीन, पी.ओ. नामीर के अनुसार, पक्षी जलवायु परिवर्तन के सबसे सटीक संकेतक होते हैं। जब किसी क्षेत्र का आवास बदलता है, तो वहां आने वाले पक्षियों की प्रजातियां भी बदल जाती हैं।
पारिस्थितिक बदलाव का प्रमाण: मोर का उदाहरण
एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि मोर, जो पारंपरिक रूप से शुष्क और खुले मैदानों के पक्षी हैं, अब केरल में तेजी से फैल रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से, 1800 के दशक के ब्रिटिश दस्तावेज़ों और 1930 के दशक में प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सालिम अली के रिकॉर्ड में केरल के अधिकांश हिस्सों में मोर की उपस्थिति नहीं थी। केरल एक आर्द्र और घना क्षेत्र रहा है, लेकिन मोर का प्रसार यह दर्शाता है कि राज्य अब धीरे-धीरे शुष्क और खुले परिदृश्य में परिवर्तित हो रहा है।
"पक्षी प्रजातियों का वितरण हमें यह बताने में सक्षम है कि हमारा पर्यावरण किस दिशा में जा रहा है और नीति निर्माताओं को इसके आधार पर ठोस निर्णय लेने चाहिए।"
कार्यप्रणाली और तकनीक का उपयोग
इस एटलस का डेटा संग्रह अत्यंत व्यवस्थित है। स्वयंसेवकों को शुष्क (जनवरी से मार्च) और गीले (जुलाई से सितंबर) मौसमों में सुबह और शाम के समय 15-15 मिनट की चार चेकलिस्ट तैयार करनी होती हैं। डेटा को रिकॉर्ड करने के लिए वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त e-Bird ऐप और पक्षियों की आवाज़ पहचानने के लिए Merlin ऐप का उपयोग किया जा रहा है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि केरल बर्ड एटलस 2.0 जैसे नागरिक विज्ञान प्रोजेक्ट्स डेटा के लोकतंत्रीकरण को बढ़ावा देते हैं। जब आम नागरिक वैज्ञानिक डेटा एकत्र करते हैं, तो यह न केवल सरकारी डेटा की कमी को पूरा करता है, बल्कि समुदाय में पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी पैदा करता है। यह डेटा भविष्य में शहरी नियोजन और वन संरक्षण नीतियों के लिए आधार बनेगा।
कोच्चि के अनुभवी पक्षी प्रेमी जयदेव मेनन ने इस परियोजना में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने पिछले 10 वर्षों में e-Bird ऐप पर 24,000 से अधिक चेकलिस्ट जमा की हैं, जो उनके अटूट समर्पण को दर्शाता है। यह एटलस केवल पक्षियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जल निकायों, अंजीर के पेड़ों और आक्रामक पौधों की उपस्थिति का भी विवरण शामिल है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: केरल बर्ड एटलस 2.0 का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इसका मुख्य उद्देश्य पिछले 10 वर्षों में केरल के पक्षी वितरण और उनकी संख्या में आए बदलावों का अध्ययन करना है ताकि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझा जा सके।
प्रश्न 2: इस परियोजना में आम नागरिक कैसे मदद कर रहे हैं?
उत्तर: स्वयंसेवक e-Bird जैसे ऐप्स का उपयोग करके विशिष्ट ग्रिड क्षेत्रों में पक्षियों का अवलोकन और डेटा रिकॉर्ड कर रहे हैं।