पंजाब‑हरियाणा हाई कोर्ट ने शांति पूर्ण प्रदर्शन को मौलिक अधिकार मानते हुए कहा कि यदि प्रदर्शन हिंसक हो जाए तो अधिकारियों को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। कोर्ट ने 20 अगस्त तक स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया।

मुख्य बिंदु

  • शांति पूर्ण प्रदर्शन मौलिक अधिकार है।
  • यदि प्रदर्शन हिंसक हो जाए तो अधिकारियों को हस्तक्षेप करना चाहिए।
  • पीएचएचसी ने 20 अगस्त तक स्थिति रिपोर्ट जमा करने का आदेश दिया।

15 अगस्त 2026 को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने दोहराया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार भारतीय संविधान में निहित है, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा खतरे में पड़ने पर कानून प्रवर्तन एजेंसियों का कर्तव्य है कि वे कार्रवाई करें।

अध्यक्ष न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा (अस्थायी) और न्यायाधीश रोहित कपूर की डिवीजन बेंच ने चंडीगढ़ के वकील विवेक सिंहला द्वारा दायर सार्वजनिक हित याचिका (पीआईएल) सुनी, जिसमें क्वामी इंसाफ मोर्चा से जुड़े बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों को रोकने के निर्देश मांगे गए थे।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यह निर्णय नागरिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन स्पष्ट करता है, जिससे पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में पुलिस को वैध भीड़ नियंत्रण उपायों की दिशा मिलती है।

"अदालत का प्रतिबंधात्मक कार्रवाई पर ज़ोर लोकतांत्रिक समाजों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है।" – प्रो. अनन्या शर्मा, संवैधानिक कानून विशेषज्ञ।

अदालत ने हरियाणा गृह सचिव को उत्तरदायी पक्ष के रूप में शामिल करने का आदेश दिया और प्रशासन को यातायात मार्ग खुला रखने, बिना अनुमति के अवरोध को हटाने और उल्लंघन करने वालों को क़ानून के तहत सख़्त दण्ड देने की निर्देश दिया।

क्या आप जानते हैं?: पिछले दशक में पीएचएचसी ने 200 से अधिक प्रदर्शन‑संबंधी मामलों पर निर्णय दिया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न १: हिंसक प्रदर्शन क्या माना जाता है?
उत्तर: वह कोई भी कार्य जो सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा पहुंचाता है, संपत्ति को नुकसान पहुँचाता है या आवश्यक सेवाओं को बाधित करता है।

प्रश्न २: क्या अधिकारी पूर्व में ही प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा सकते हैं?
उत्तर: केवल विश्वसनीय खतरे का आकलन करने के बाद ही प्रतिबंधित करने की अनुमति है, जैसा कि कानून में निर्धारित है।