एम्स दिल्ली के डॉक्टरों ने एक अत्यधिक मोटापे से ग्रस्त 32 वर्षीय व्यक्ति पर सफल बेरियाट्रिक सर्जरी की है। महीने भर के विशेष आहार और चिकित्सा हस्तक्षेप के बाद, डॉक्टरों ने जटिलताओं के बावजूद इस चुनौतीपूर्ण ऑपरेशन को अंजाम दिया।
मुख्य बातें
- मरीज का वजन 209 किलोग्राम और BMI 74 kg/m² था।
- सर्जरी से पहले 32 दिनों के विशेष आहार से वजन 172 किलोग्राम तक लाया गया।
- डॉक्टरों ने लैप्रोस्कोपिक 'वन एनास्टोमोसिस गैस्ट्रिक बाईपास' तकनीक का उपयोग किया।
- मरीज अब बिना सहायता के चलने और सांस लेने में सक्षम है।
एम्स (AIIMS), दिल्ली के विशेषज्ञों ने चिकित्सा विज्ञान की सीमाओं को चुनौती देते हुए एक 32 वर्षीय व्यक्ति की सफल बेरियाट्रिक सर्जरी की है। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मरीज का वजन 209 किलोग्राम था और उसकी स्थिति अत्यंत गंभीर थी।
चुनौतियों भरा सफर
मरीज को न केवल अत्यधिक मोटापे का सामना करना पड़ रहा था, बल्कि उसे गंभीर 'ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया' (OSA), श्वसन विफलता और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं से भी जूझना पड़ रहा था। उसकी स्थिति इतनी नाजुक थी कि उसे आपातकालीन ट्रेकियोस्टॉमी की आवश्यकता पड़ी और वह एक महीने से अधिक समय तक CPAP सपोर्ट पर था।
बोजोकमीडिया विश्लेषण (BozokMedia analysis shows...)
बोजोकमीडिया विश्लेषण से पता चलता है कि इस मामले की सफलता केवल सर्जरी में नहीं, बल्कि सर्जरी से पहले की गई तैयारी में निहित थी। मरीज के पेट का घेरा (Abdominal girth) 198 सेमी था, जिससे उसे सामान्य ऑपरेशन टेबल पर लिटाना असंभव था। डॉक्टरों ने एक महीने तक बहुत कम कैलोरी वाला आहार (VLCD) और श्वसन फिजियोथेरेपी के माध्यम से वजन को 209 किलो से घटाकर 172 किलो कर दिया, जिससे सर्जरी संभव हो सकी।
मरीज के पेट के घेरे को कम करना ही इस जटिल सर्जरी को सफल बनाने की असली कुंजी साबित हुई।
सर्जरी के बाद का परिणाम
डॉक्टरों ने लैप्रोस्कोपिक वन एनास्टोमोसिस गैस्ट्रिक बाईपास (OAGB) तकनीक का उपयोग किया। सर्जरी के बाद मरीज की स्थिति में नाटकीय सुधार देखा गया है। डिस्चार्ज के समय तक उसका वजन घटकर 160 किलोग्राम रह गया और वह बिना किसी सहायता के चलने में सक्षम हो गया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. बेरियाट्रिक सर्जरी क्या है?
यह मोटापे के इलाज के लिए की जाने वाली एक सर्जिकल प्रक्रिया है जो पाचन तंत्र को बदल देती है ताकि शरीर कम कैलोरी अवशोषित करे।
2. इस मामले में मुख्य चुनौती क्या थी?
मरीज का अत्यधिक वजन और सांस लेने में कठिनाई सबसे बड़ी चुनौती थी, जिसे विशेष आहार और फिजियोथेरेपी से नियंत्रित किया गया।