दिल्ली AIIMS के आरपी सेंटर ने कॉर्नियल ब्लाइंडनेस के इलाज के लिए आर्टिफिशियल कॉर्निया ट्रांसप्लांट की शुरुआत की है। यह तकनीक उन लाखों लोगों के लिए वरदान साबित हो सकती है जिन्हें डोनर कॉर्निया उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।

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मुख्य बिंदु

  • AIIMS दिल्ली के आरपी सेंटर ने सीमित मरीजों में आर्टिफिशियल कॉर्निया का सफल प्रयोग शुरू किया है।
  • भारत में कॉर्निया डोनर्स की भारी कमी है, केवल 3% जरूरत पूरी हो पाती है।
  • अब तक लगभग 20 मरीजों में इस आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा चुका है।
  • देश की 8.2% आबादी कॉर्निया ब्लाइंडनेस से प्रभावित है।

भारत में लाखों लोग कॉर्नियल ब्लाइंडनेस (कॉर्निया के खराब होने के कारण अंधापन) से जूझ रहे हैं। वर्तमान में इसका एकमात्र प्रभावी इलाज कॉर्निया ट्रांसप्लांट है, लेकिन डोनर्स की कमी के कारण मरीजों को सालों इंतजार करना पड़ता है। इस गंभीर समस्या का समाधान खोजने के लिए AIIMS दिल्ली के आरपी सेंटर ने आर्टिफिशियल कॉर्निया तकनीक को अपनाया है।

प्रोफेसर डॉ. राजेश सिन्हा के अनुसार, पिछले एक साल में कुछ चुनिंदा मरीजों में आर्टिफिशियल कॉर्निया का प्रत्यारोपण किया गया है। यह कृत्रिम कॉर्निया उन मरीजों के लिए एक वैकल्पिक रास्ता प्रदान करता है जिनके लिए प्राकृतिक डोनर कॉर्निया उपलब्ध नहीं हैं या जिन्हें सामान्य ट्रांसप्लांट से लाभ मिलने की संभावना कम है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, भारत में अंग दान की दर वैश्विक औसत से काफी कम है। जब हम देखते हैं कि वार्षिक आवश्यकता के मुकाबले केवल 3% कॉर्निया ही उपलब्ध हो पाते हैं, तो आर्टिफिशियल कॉर्निया जैसी तकनीक केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आवश्यकता बन जाती है। यह चिकित्सा विज्ञान में एक क्रांतिकारी कदम है जो भविष्य में पूर्ण दृष्टि बहाली की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

"आर्टिफिशियल कॉर्निया उन मरीजों के लिए जीवन बदलने वाला विकल्प है जिनके पास डोनर की प्रतीक्षा करने का समय नहीं है या जिनका मामला जटिल है।"

प्राकृतिक बनाम आर्टिफिशियल कॉर्निया

विशेषता प्राकृतिक कॉर्निया (डोनर) आर्टिफिशियल कॉर्निया
उपलब्धता अत्यधिक सीमित (डोनर पर निर्भर) तकनीकी रूप से निर्मित (उपलब्ध)
सफलता दर उच्च (यदि मैच हो जाए) सीमित मामलों में सफल (प्रायोगिक)
प्रतीक्षा समय लंबा इंतजार त्वरित प्रक्रिया संभव

हालांकि तकनीक आगे बढ़ रही है, लेकिन डॉ. सिन्हा ने जोर देकर कहा कि कॉर्निया डोनेशन के प्रति जागरूकता बढ़ाना अभी भी अनिवार्य है। एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका दान दो लोगों के जीवन में रोशनी ला सकता है।

क्या आप जानते हैं?: भारत में 0 से 49 वर्ष की आयु के लोगों में कॉर्निया ब्लाइंडनेस का हिस्सा लगभग 38% है, जो उत्पादक आयु वर्ग के लिए एक बड़ी चुनौती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: क्या आर्टिफिशियल कॉर्निया हर मरीज के लिए उपलब्ध है?
उत्तर: नहीं, वर्तमान में AIIMS में इसका उपयोग केवल विशिष्ट और गंभीर मामलों में किया जा रहा है।

प्रश्न 2: क्या यह प्राकृतिक कॉर्निया की तरह ही काम करता है?
उत्तर: यह खराब कॉर्निया की जगह लेने का प्रयास करता है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता मामले की जटिलता पर निर्भर करती है।