विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि लोग बिना इलाज के ADHD निदान (diagnosis) की मांग कर रहे हैं, जिससे यह एक चिकित्सा स्थिति के बजाय एक 'सामाजिक पहचान' बनता जा रहा है।
- बढ़ते रुझान के कारण लोग बिना उपचार के केवल ADHD निदान प्राप्त करना चाहते हैं।
- विशेषज्ञों का मानना है कि ADHD को एक 'सामाजिक पहचान' के रूप में देखा जा रहा है।
- निजी क्षेत्र द्वारा प्रदान किए जा रहे निम्न गुणवत्ता वाले निदानों पर सवाल उठाए गए हैं।
- चर्चा का विषय यह है कि क्या स्कूलों को बच्चों को दवा देने के बजाय खुद को बदलना चाहिए।
हाल के वर्षों में, ADHD (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) के निदान की मांग में भारी वृद्धि देखी गई है। हालांकि, चिंताजनक बात यह है कि बड़ी संख्या में लोग निदान प्राप्त करने के बाद उपचार की राह नहीं चुन रहे हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि ADHD अब एक चिकित्सा विकार के बजाय एक 'सामाजिक पहचान' (social identity) बनता जा रहा है।
यूके एडल्ट ADHD नेटवर्क के संस्थापक, मनोचिकित्सक डॉ. मारियो एडमौ के अनुसार, कई लोग अब ADHD को एक विकार के बजाय एक पहचान के रूप में देखते हैं। इसके परिणामस्वरूप, लोग अक्सर कम गुणवत्ता वाले निजी प्रदाताओं से मूल्यांकन करवाते हैं, जिससे उन्हें यह विश्वास हो जाता है कि उन्हें एक ऐसी स्थिति है जिसकी उन्हें केवल पहचान की आवश्यकता है, न कि उपचार की।
क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि चिकित्सा का 'वस्तुकरण' (commodification) एक गंभीर समस्या बन रहा है। जब निजी क्षेत्र निदान के बाजार पर हावी हो जाता है, तो लाभ कमाने की होड़ में निदान की गुणवत्ता गिर सकती है। यह न केवल स्वास्थ्य प्रणाली पर दबाव डालता है, बल्कि उन लोगों के लिए भी 'दोहरा कलंक' पैदा करता है जिन्हें वास्तव में इस विकार की आवश्यकता है।
ADHD को केवल एक सामाजिक निर्माण मानना स्थापित नैदानिक स्थितियों को कमतर आंकना है, जो शिक्षा और रोजगार में असमानता को बढ़ावा दे सकता है।
चैनल 4 की आगामी डॉक्यूमेंट्री 'The Great ADHD Myth?' में मनोचिकित्सक डॉ. मैक्स पेम्बर्टन का तर्क है कि स्कूलों को बच्चों को एक मानक ढांचे में फिट करने के लिए दवा देने के बजाय, बच्चों की विविध आवश्यकताओं के अनुसार खुद को ढालना चाहिए। उनका मानना है कि ADHD एक 'सामाजिक निर्माण' है जो समाज की कठोर अपेक्षाओं से उपजा है।
वहीं, रॉयल कॉलेज ऑफ साइकियाट्रिस्ट के पूर्व प्रमुख प्रोफेसर दिनेश भुगरा ने चेतावनी दी है कि हम सामान्य मानवीय प्रतिक्रियाओं का चिकित्साकरण (medicalization) कर रहे हैं। उनका मानना है कि यह लेबल लोगों को समाज में एक विशेष 'कैशेट' या विशेषाधिकार देने के लिए उपयोग किया जा रहा है, जो कि चिकित्सा विज्ञान के मूल उद्देश्य से भटकना है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. क्या ADHD एक वास्तविक बीमारी है?
हाँ, शोध मस्तिष्क में जैविक अंतरों की पुष्टि करते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसके निदान के तरीके और सामाजिक धारणाएं बदल रही हैं।
2. निजी निदान और NHS निदान में क्या अंतर है?
निजी निदान अक्सर जल्दी मिल जाते हैं लेकिन उनकी गुणवत्ता और विनियमन (regulation) पर सवाल उठाए जाते हैं, जबकि NHS पर अत्यधिक दबाव के कारण प्रतीक्षा समय बहुत अधिक है।