गुंटूर में आयोजित ललिता सीएमई सीरीज में प्रमुख न्यूरोलॉजिस्ट्स ने बताया कि पेरिफेरल न्यूरोपैथी, विशेष रूप से बुजुर्गों और मधुमेह रोगियों में तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों ने उन्नत इमेजिंग और समय पर उपचार की आवश्यकता पर जोर दिया।
- सामान्य आबादी का 1% और 60 वर्ष से अधिक आयु के वयस्कों का 10% पेरिफेरल न्यूरोपैथी से प्रभावित है।
- मधुमेह (डायबिटीज) इस बीमारी का मुख्य कारण है, जो लगभग 50% मामलों के लिए जिम्मेदार है।
- नोडोपैथी और पैरानोडोपैथी जैसे नए विकार अंगों में तेजी से कमजोरी और कंपन पैदा कर रहे हैं।
- निदान के लिए MR न्यूरोग्राफी और नर्व अल्ट्रासाउंड जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है।
गुंटूर में ललिता पीवीएस इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज द्वारा 'एडवांसेस इन पेरिफेरल न्यूरोपैथी' पर आयोजित ललिता सीएमई (CME) सीरीज में चिकित्सा जगत के दिग्गजों ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लगभग 200 डॉक्टरों, न्यूरोलॉजिस्ट और संकायों ने भाग लिया ताकि भारतीय आबादी में बढ़ते तंत्रिका विकारों (nerve disorders) पर चर्चा की जा सके।
बॉम्बे अस्पताल, मुंबई के डॉ. सतीश खदिलकर ने नोडोपैथी और पैरानोडोपैथी नामक नए तंत्रिका विकारों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ये स्थितियां चारों अंगों में तेजी से कमजोरी, चलने में अस्थिरता और कंपन का कारण बन सकती हैं। उन्होंने जोर दिया कि प्रभावित नसों की सटीक पहचान के लिए MR न्यूरोग्राफी और नर्व अल्ट्रासाउंड का उपयोग अब अनिवार्य हो गया है।
न्यूरोसाइंसेज की एचओडी और मैनेजिंग डायरेक्टर पी. विजया ने चौंकाने वाले आंकड़े साझा करते हुए बताया कि जहां सामान्य आबादी में इसका प्रसार 1% है, वहीं 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में यह बढ़कर 10% हो जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि लगभग आधे मामले मधुमेह से जुड़े हैं, जो भारत में मधुमेह की जटिलताओं की पहचान में कमी को दर्शाता है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में बढ़ती बुजुर्ग आबादी और मधुमेह महामारी का संगम एक 'खामोश संकट' पैदा कर रहा है। जब न्यूरोपैथी का समय पर पता नहीं चलता, तो यह स्थायी विकलांगता और जीवन की गुणवत्ता में भारी गिरावट का कारण बनता है। स्पाइनल कॉर्ड स्टिमुलेशन जैसे न्यूरोमोड्यूलेशन विकल्पों की ओर झुकाव यह दर्शाता है कि अब चिकित्सा विज्ञान केवल लक्षणों के इलाज से आगे बढ़कर उन्नत उपचार की ओर बढ़ रहा है।
न्यूरोपैथी के मरीजों में स्थायी विकलांगता को रोकने का एकमात्र तरीका समय पर पहचान और व्यवस्थित मूल्यांकन है।
हैदराबाद के आर. मुरलीधर रेड्डी ने कहा कि डायबिटिक न्यूरोपैथी से बचाव के लिए बेहतर ग्लाइसेमिक नियंत्रण, कोलेस्ट्रॉल, मोटापे और उच्च रक्तचाप का प्रबंधन और नियमित व्यायाम अत्यंत आवश्यक है।
सम्मेलन में संक्रामक रोगों के प्रभाव पर भी चर्चा हुई। निमहंस (NIMHANS) के मधु नागप्पा ने बताया कि कोविड-19, ज़िका और एंटरोवायरस जैसे वायरस भी तंत्रिका क्षति (nerve damage) का कारण बन रहे हैं, जो एक नई स्वास्थ्य चुनौती है।
| कारक | सामान्य आबादी | बुजुर्ग (60+) |
|---|---|---|
| प्रसार दर | ~1% | ~10% |
| मुख्य कारण | विविध/आनुवंशिक | मधुमेह/आयु-संबंधित |
| जोखिम स्तर | कम से मध्यम | उच्च |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: पेरिफेरल न्यूरोपैथी के मुख्य लक्षण क्या हैं?
इसके लक्षणों में हाथों और पैरों में सुन्नपन, झुनझुनी, कमजोरी या दर्द शामिल है। गंभीर मामलों में संतुलन खोना और कंपन भी हो सकता है।
प्रश्न 2: डायबिटिक न्यूरोपैथी को कैसे रोका जा सकता है?
ब्लड शुगर का सख्त नियंत्रण, स्वस्थ वजन बनाए रखना, बीपी और कोलेस्ट्रॉल का प्रबंधन और नियमित शारीरिक गतिविधि के माध्यम से इसे रोका जा सकता है।