भारत में अंग प्रत्यारोपण के आंकड़ों ने एक गहरी लैंगिक खाई को उजागर किया है, जहां महिलाएं बड़ी संख्या में अंग दान कर रही हैं, जबकि प्राप्तकर्ता मुख्य रूप से पुरुष हैं। यह असमानता सामाजिक दबाव और पितृसत्तात्मक ढांचे की ओर इशारा करती है।

  • 2019-2023 के बीच 63.8% जीवित अंग दाता महिलाएं थीं।
  • उसी अवधि में 69.8% अंग प्राप्तकर्ता पुरुष थे।
  • सामाजिक और पारिवारिक अपेक्षाएं महिलाओं को दान के लिए प्रेरित कर रही हैं।
  • स्वास्थ्य प्रणाली में न्याय और समानता सुनिश्चित करने की तत्काल आवश्यकता है।

भारत में अंग प्रत्यारोपण (Organ Transplantation) के क्षेत्र में एक चिंताजनक लैंगिक असंतुलन उभर कर सामने आया है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि अंग दान की प्रक्रिया में महिलाएं कहीं अधिक सक्रिय भूमिका निभा रही हैं, जबकि अंग प्राप्त करने वालों में पुरुषों का वर्चस्व है। यह केवल एक चिकित्सा सांख्यिकी नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज में व्याप्त गहरे सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे का प्रतिबिंब है।

नेशनल ऑर्गन्स एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (NOTTO) के आंकड़ों के अनुसार, 2019 और 2023 के बीच, जीवित अंग दाताओं में 63.8% महिलाएं थीं। इसके विपरीत, अंग प्राप्त करने वाले लोगों में 69.8% पुरुष थे। यह डेटा स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अंग दान की प्रक्रिया में 'देने वाले' और 'पाने वाले' के बीच एक स्पष्ट लैंगिक विभाजन मौजूद है।

क्यों यह महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह असमानता केवल जैविक कारणों से नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना से प्रेरित है। जब महिलाएं परिवार के लिए अपने शरीर का त्याग करने को अपनी जिम्मेदारी मान लेती हैं, तो यह 'स्वैच्छिक दान' और 'सामाजिक दबाव' के बीच की रेखा को धुंधला कर देता है। यदि स्वास्थ्य प्रणाली इस अंतर को संबोधित नहीं करती है, तो यह स्वास्थ्य सेवा में न्याय और स्वायत्तता के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।

अंग दान में लैंगिक असंतुलन केवल चिकित्सा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह महिलाओं की स्वायत्तता और सामाजिक भूमिकाओं के बीच के संघर्ष को दर्शाता है।

इस असंतुलन के पीछे कई कारण हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि पारिवारिक संरचनाओं में महिलाओं, विशेषकर माताओं और पत्नियों से अपेक्षा की जाती है कि वे परिवार की जरूरतों को अपने स्वास्थ्य से ऊपर रखें। आंकड़ों के अनुसार, माताओं द्वारा किए जाने वाले कुल माता-पिता के दान में 73% की हिस्सेदारी होती है, जबकि विवाहित जोड़ों के बीच पत्नियों का योगदान 91% तक पहुंच जाता है।

दूसरी ओर, पुरुषों के मामले में आर्थिक भूमिका एक बाधा बन सकती है। पुरुष अक्सर परिवार के मुख्य कमाने वाले माने जाते हैं, इसलिए सर्जरी के बाद रिकवरी के दौरान आय की हानि का डर उन्हें दान करने से रोक सकता है। यह आर्थिक दबाव अक्सर दान के बोझ को महिलाओं की ओर धकेल देता है, जिन्हें परिवार के आर्थिक ढांचे में अक्सर 'कम खर्च योग्य' माना जाता है।

श्रेणी (Category)महिलाएं (Women)पुरुष (Men)
जीवित अंग दाता (Living Donors)63.8%36.2%
अंग प्राप्तकर्ता (Recipients)30.2%69.8%

इस खाई को पाटने के लिए केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं है। हमें अंग प्रत्यारोपण सेवाओं को ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले क्षेत्रों तक ले जाने की आवश्यकता है और यह सुनिश्चित करना होगा कि संभावित दाताओं का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन गहनता से किया जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि निर्णय पूरी तरह से स्वैच्छिक है।

Did You Know?: भारत में, विवाहित जोड़ों के बीच अंग दान के मामलों में पत्नियों की भागीदारी 91% तक देखी गई है।

Frequently Asked Questions

1. अंग दान में लैंगिक असमानता का मुख्य कारण क्या है?
इसका मुख्य कारण सामाजिक अपेक्षाएं और पितृसत्तात्मक ढांचा है, जहां महिलाओं से परिवार के लिए बलिदान की अपेक्षा की जाती है।

2. NOTTO क्या है?
NOTTO (National Organ and Tissue Transplant Organization) भारत में अंग प्रत्यारोपण के समन्वय के लिए जिम्मेदार नोडल एजेंसी है।