भूपाल के राज्य संग्रहालय में स्थित 12वीं सदी की लाल बलुआ पत्थर की प्रतिमा को अब देवी गायत्री के रूप में पुनः पहचाना गया है। डिजिटल दस्तावेज़ीकरण और 3डी मैपिंग ने वह शास्त्रीय संकेत उजागर किए जो शताब्दियों से अनदेखे रहे, जिससे इस 900 साल पुराने भ्रम का अंत हुआ।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- 12वीं सदी की धरोहर अब गायत्री के रूप में पहचानी गई
- डिजिटल 3D मैपिंग ने पहचान में मदद की
- सांसारिक विरासत में नई डिजिटल प्रस्तुति
भूपाल के राज्य संग्रहालय में प्रदर्शित एक शानदार 12वीं सदी की लाल बलुआ पत्थर की प्रतिमा, जिसे दशकों से देवी सरस्वती के रूप में पहचाना जाता था, अब वैज्ञानिक जांच के बाद देवी गायत्री के रूप में मान्य हो गई है। यह पुनः पहचान न केवल एक लेबल बदलने का मामला है, बल्कि भारतीय शिल्प कला के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय को पुनः उजागर करती है।
डिजिटल तकनीक ने खोए संकेतों को उजागर किया
आर्कियोलॉजिस्ट रमेश यादव और उनके सहयोगियों ने उच्च-रिज़ॉल्यूशन 3डी स्कैनिंग एवं डिजिटल दस्तावेज़ीकरण का उपयोग कर प्रतिमा के प्रत्येक बारीकियों का विश्लेषण किया। इस प्रक्रिया ने ऐसी आइकनोग्राफिक विशेषताओं को सामने लाया जो शास्त्रीय सिल्प-सास्त्र में गायत्री के वर्णन से मेल खाती थीं, जैसे चार भुजाओं में मोती, कमल और वेदों को धारण करना, तथा बगल में स्थित हंसा (स्वान) जो ज्ञान का प्रतीक है।
वीणा की अनुपस्थिति ने स्पष्ट किया
परम्परागत रूप से सरस्वती को वीणा बजाते हुए चित्रित किया जाता है, विशेषकर गुप्त काल (320‑550 ईस्वी) के बाद की कलाकृतियों में। इस प्रतिमा में वीणा का अभाव, जबकि वह वेदों और कमल को धारण कर रही है, ने विशेषज्ञों को गायत्री की ओर मोड़ दिया। इतिहासकार एवं पुरातत्वविद् बी.के. लोखंडे ने कहा, “वीणा की अनुपस्थिति ही इस प्रतिमा को सरस्वती से अलग कर गायत्री की पहचान सुनिश्चित करती है।”
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
धर, जो 9वीं‑14वीं शताब्दी के पार्मर वंश की राजधानी थी, अपनी पश्चिमी चालुक्य प्रभाव वाली शिल्प शैली के लिए प्रसिद्ध है। इस प्रतिमा में उस शैली की कोमल रचना और अलंकरण स्पष्ट रूप से दिखते हैं, साथ ही यह शास्त्रीय वर्णनों के साथ सटीक मेल खाती है। गायत्री, वैदिक मंत्रों की माता, वेदों की मातृसत्ता और ब्रह्मविद्या की प्रतीक के रूप में पूज्य है; इसलिए इस दुर्लभ प्रतिमा का पुनः पहचान भारतीय सांस्कृतिक धरोहर में नई चमक लाता है।
डिजिटल विरासत मिशन में नई भूमिका
मध्य प्रदेश के डिजिटल विरासत मिशन ने इस पुनः पहचान को अपने प्रमुख प्रॉमोटर के रूप में अपनाया है। आर्कियोलॉजी कमिश्नर मदन कुमार नागरगोए ने बताया कि प्रमाणित 3डी मॉडल और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से जनता को इस दुर्लभ गायत्री प्रतिमा का अध्ययन करने का अवसर मिलेगा, जिससे शैक्षणिक और सार्वजनिक जागरूकता दोनों में वृद्धि होगी।