सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह मंदिरों में हाथियों के उपयोग के पीछे की आस्था पर सवाल नहीं उठा रहा है, बल्कि केवल उनके स्वास्थ्य और उचित प्रबंधन को सुनिश्चित करना चाहता है। अदालत ने सभी बंदी हाथियों के लिए अनिवार्य चिकित्सा रिकॉर्ड और डीएनए प्रोफाइलिंग के निर्देश दिए हैं।

  • सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामला धार्मिक अधिकारों का नहीं, बल्कि हाथियों के स्वास्थ्य और कल्याण का है।
  • देश में बंदी हाथियों की संख्या बढ़कर 2,725 हो गई है।
  • अदालत ने सभी बंदी हाथियों के लिए अनिवार्य डीएनए प्रोफाइलिंग और चिकित्सा रिकॉर्ड बनाए रखने का निर्देश दिया है।
  • हाथियों के लिए विशेष क्लीनिकों की स्थापना और परिवहन नियमों के सख्त पालन पर जोर दिया गया है।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि मंदिरों में सेवा करने वाले हाथियों को दिव्यता के प्रतीक के रूप में सम्मान दिया जाना चाहिए और उनके साथ मानवीय व्यवहार होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने देश भर में बंदी हाथियों के रखरखाव, स्वास्थ्य और कल्याण के संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

अदालत ने साफ तौर पर कहा कि वह धार्मिक अधिकारों या मंदिरों में हाथियों के उपयोग के पीछे की आस्था की जांच नहीं कर रही है। कोर्ट का मुख्य उद्देश्य निजी व्यक्तियों, सर्कस, मंदिरों, वन विभागों, चिड़ियाघरों और पुनर्वास केंद्रों द्वारा बंदी हाथियों के प्रबंधन में सर्वोत्तम प्रथाओं (Best Practices) को लागू करना है।

हाथियों की वर्तमान स्थिति और डेटा

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने फरवरी 2026 का एक ज्ञापन प्रस्तुत किया। आंकड़ों के अनुसार, बंदी हाथियों की संख्या 2,675 से बढ़कर 2,725 हो गई है। इनमें से 1,678 निजी व्यक्तियों के पास, 768 वन विभागों के पास, 332 पुनर्वास केंद्रों में, 96 मंदिरों में, 63 चिड़ियाघरों में और 47 सर्कस में हैं।

"हाथियों का प्रबंधन केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी है, क्योंकि ये जीव हमारी सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग हैं।"

धार्मिक आस्था बनाम पशु अधिकार

केरल के मंदिर प्रबंधनों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने तर्क दिया कि केरल के मंदिर उत्सवों में हाथियों का उपयोग आस्था का एक अनिवार्य हिस्सा है और वहां नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता है। दूसरी ओर, वन्यजीव बचाव और पुनर्वास केंद्र (NGO) की ओर से अधिवक्ता अपर्णा भट ने कहा कि यह मामला धर्म का नहीं, बल्कि उन मानसिक और शारीरिक यातनाओं का है जो ये जानवर व्यावसायिक और धार्मिक गतिविधियों के दौरान झेलते हैं।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि सुप्रीम कोर्ट का यह रुख एक संतुलित दृष्टिकोण है। अदालत ने एक तरफ आस्था का सम्मान किया है, तो दूसरी तरफ 'पशु कल्याण' को सर्वोपरि रखा है। यह निर्णय भविष्य में वन्यजीव संरक्षण कानूनों और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच टकराव को कम करने में मदद करेगा।

श्रेणी हाथियों की संख्या (लगभग)
निजी स्वामित्व 1,678
वन विभाग 768
पुनर्वास केंद्र 332
मंदिर 96

अदालत ने अब केंद्र सरकार को अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी करने और राज्यों के साथ मिलकर विशेष एलीफेंट क्लीनिक स्थापित करने का निर्देश दिया है। साथ ही, 'गज सूचना' मोबाइल ऐप के माध्यम से डीएनए प्रोफाइलिंग को पूरा करने और 'बंदी हाथी प्रबंधन के सिद्धांत' नामक हैंडबुक प्रकाशित करने की बात कही गई है।

क्या आप जानते हैं?: केरल में अब पारंपरिक हाथियों के विकल्प के रूप में 'मैकेनिकल हाथियों' का उपयोग कुछ मंदिरों में शुरू हो गया है ताकि जीवित जानवरों पर बोझ कम किया जा सके।

Frequently Asked Questions

1. क्या सुप्रीम कोर्ट ने मंदिरों में हाथियों के उपयोग पर रोक लगा दी है?
नहीं, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह धार्मिक अधिकारों या आस्था में हस्तक्षेप नहीं कर रहा है, केवल उनके स्वास्थ्य और कल्याण पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

2. 'गज सूचना' ऐप का क्या उद्देश्य है?
यह एक जेनेटिक डेटाबेस है जिसका उपयोग बंदी हाथियों की डीएनए प्रोफाइलिंग और उनकी ट्रैकिंग के लिए किया जाता है।