विदेश मंत्री सौ. जैशंकर द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के गैर-स्थायी सीट के लिए भारत ने अभियान शुरू किया है। ताजिकिस्तान की प्रतिस्पर्धा और बदलते भू‑राजनीतिक समीकरण इस चुनाव को पहले से अधिक कठिन बनाते हैं। क्या भारत आवश्यक दो‑तिहाई बहुमत हासिल कर पाएगा?

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मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • भारत 2028‑29 के लिए यूएन सुरक्षा परिषद में गैर‑स्थायी सीट के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहा है।
  • ताजिकिस्तान की सहभागिता से एशिया‑पैसिफिक सीट पर मुकाबला तीव्र हो गया है।
  • स्थायी सदस्यता की माँग के साथ, भारत को अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कैरिबियन और अरब देशों से समर्थन चाहिए।

विदेश मंत्री सौ. एस. जैशंकर ने 2027 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 82वें सत्र में होने वाले मतदान से पहले भारत की सुरक्षा परिषद अभियान को औपचारिक रूप से लॉन्च किया। यह अभियान 2028‑29 अवधि के लिए एक दो‑साल की गैर‑स्थायी सीट हासिल करने के लक्ष्य पर केंद्रित है, परन्तु इसका बड़ा उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भविष्य में होने वाले सुधारों को आगे बढ़ाना भी है।

पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ

भारत ने अब तक आठ बार सुरक्षा परिषद में गैर‑स्थायी सदस्यता प्राप्त की है, लेकिन स्थायी सदस्य बनने की दलील हमेशा से उसके विदेश नीति का प्रमुख हिस्सा रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित इस परिषद को आज की बदलती भू‑राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं माना जाता, और भारत ने कई बार सुधार की माँग की है, जिसमें स्थायी और गैर‑स्थायी दोनों सीटों की संख्या बढ़ाना शामिल है।

प्रतिद्वंद्वी और चुनौतियाँ

आशिया‑पैसिफिक सीट के लिए ताजिकिस्तान ने भी भागीदारी दर्ज करवाई है, जिससे भारत को इस क्षेत्र में मुस्लिम‑बहुल देशों के समर्थन को जीतने के लिए अधिक प्रयास करने पड़ेंगे। ताजिकिस्तान इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के सदस्यों से समर्थन की उम्मीद कर रहा है, जिससे भारत को अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कैरिबियन और अरब दुनिया में व्यापक गठबंधन बनाना आवश्यक हो जाएगा।

भू‑राजनीतिक प्रभाव और मतदान प्रवृत्ति

हालिया यूएन चुनावों ने दिखाया है कि भू‑राजनीतिक रुख अब मतदान पैटर्न को अधिक प्रभावित कर रहा है, न कि केवल कूटनीतिक संपर्क। जर्मनी के हालिया असफल प्रयास ने यह उजागर किया कि गाज़ा और यूक्रेन जैसे मुद्दों पर देशों की स्थिति उनके समर्थन को तय कर सकती है। भारत के लिए यह चुनौती है कि वह विभिन्न क्षेत्रों में विविध दृष्टिकोणों को संतुलित करते हुए अपना समर्थन सुनिश्चित करे।

भविष्य की संभावनाएँ

यदि भारत दो‑तिहाई बहुमत हासिल कर लेता है, तो यह न केवल एक दो‑साल का पद होगा, बल्कि भारत के स्थायी सदस्यता की दलील को और मजबूत करेगा। इस प्रक्रिया में पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक दृश्यता भी एक अतिरिक्त कारक बनकर उभरेगी, क्योंकि वह वर्तमान में सुरक्षा परिषद में गैर‑स्थायी सदस्य के रूप में सक्रिय है। अंततः, जीत या हार का निर्णय संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रत्येक सदस्य राज्य के वोट पर निर्भर करेगा, न कि केवल प्रमुख शक्ति देशों के समर्थन पर।