केरल की पेरियार नदी में औद्योगिक प्रदूषण के कारण हुई भारी मछलियों की मौत के दो साल बाद भी मछुआरे मुआवजे के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • पेरियार नदी के एलोर-एडायार औद्योगिक क्षेत्र में हुए बड़े पैमाने पर 'फिश किल' के दो साल बाद भी मछुआरों को आर्थिक राहत नहीं मिली है।
  • मत्स्य विभाग ने लगभग ₹13.75 करोड़ के मुआवजे की सिफारिश की थी, जबकि स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार नुकसान कहीं अधिक है।
  • प्रदूषण रोकने के लिए प्रस्तावित तटबंध (dyke wall) और निगरानी तंत्र जैसे महत्वपूर्ण सुझाव अब तक लागू नहीं किए गए हैं।

केरल के एर्नाकुलम जिले में स्थित पेरियार नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को पहुंचे अपूरणीय नुकसान के दो साल बीत जाने के बाद भी, स्थानीय मछुआरे और केज फार्मर्स (पिंजरा मछली पालक) सरकार से मुआवजे की आस लगाए बैठे हैं। मई 2024 में, एलोर-एडायार औद्योगिक पट्टी के पास नदी में भारी मात्रा में मृत मछलियां तैरती हुई पाई गई थीं, जिसका मुख्य कारण औद्योगिक इकाइयों से जहरीले अपशिष्टों का बहाव माना गया था।

आर्थिक संकट और गहराता कर्ज

इस त्रासदी ने न केवल नदी के जीवन को प्रभावित किया, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका को भी पटरी से उतार दिया। वरापुझा के एक केज फिश फार्मर, स्वप्नलाल के अनुसार, उन्होंने प्रत्येक पिंजरे में लगभग 1,200 कलंजी और 600 करीमीन मछलियाँ जमा की थीं। इस आपदा के कारण न केवल उनकी पूंजी डूब गई, बल्कि कई मछुआरों पर कर्ज का भारी बोझ भी बढ़ गया है। मत्स्य विभाग ने ₹13.75 करोड़ के मुआवजे का प्रस्ताव दिया था, लेकिन स्थानीय विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुल आर्थिक नुकसान ₹40 करोड़ से भी अधिक हो सकता है।

प्रदूषण नियंत्रण और सरकारी उदासीनता

केरल मत्स्य തൊഴിലാली ऐक्यवेधी (TUCI) के राज्य अध्यक्ष चार्ल्स जॉर्ज ने कहा कि मछुआरों को हुए नुकसान का वास्तविक आकलन सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है। इसके साथ ही, पेरियार मेलिनकारना विरुध समिति के प्रवक्ता पुरुषन एलोोर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रदूषण की निगरानी के लिए प्रस्तावित 'डाइक वॉल' (तटबंध) और वॉकवे जैसे महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों को अभी तक लागू नहीं किया गया है।

प्रशासनिक स्थिति

जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि आर्थिक प्रभाव पर रिपोर्ट सरकार को भेजी जा चुकी है, लेकिन वित्तीय मुआवजे पर अंतिम निर्णय अभी भी लंबित है। यह देरी न केवल मछुआरों के प्रति अन्याय है, बल्कि औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ कड़े कदम उठाने में सरकार की विफलता को भी दर्शाती है।