आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में धार्मिक आस्था और 'पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन' का हवाला देते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के लिए गांव के तालाबों से रेत निकालने के आदेश को रद्द कर दिया है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने विज़ियानगरम में तालाबों से रेत और बजरी निकालने के आदेश को अवैध घोषित किया।
  • न्यायालय ने कहा कि हिंदू, मुस्लिम और ईसाई धर्मों में जल को एक पवित्र संसाधन माना गया है।
  • कोर्ट ने 'पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन' के तहत राज्य को प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षक बताया।
  • यह निर्णय अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और पर्यावरण संरक्षण की रक्षा करता है।

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए विज़ियानगरम जिले के कोथापलेम गांव में राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-130CD) परियोजना के लिए तालाबों से खुदाई करने की अनुमति देने वाले जिला कलेक्टर के आदेशों को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचेम ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सार्वजनिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के नाम पर कानूनी सुरक्षा उपायों और महत्वपूर्ण जल निकायों के साथ समझौता नहीं किया जा सकता है।

धार्मिक आस्था और जल की पवित्रता

न्यायालय ने अपने आदेश में एक अत्यंत संवेदनशील और गहरा दृष्टिकोण अपनाया। न्यायमूर्ति कुंचेम ने उल्लेख किया कि दुनिया के प्रमुख धर्मों में जल को केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि एक पवित्र और जीवन देने वाली शक्ति माना गया है। उन्होंने कहा, "हिंदू धर्म में गंगा, यमुना और गोदावरी जैसी नदियों को दिव्य माता के रूप में पूजा जाता है। वहीं, इस्लाम में जल को ईश्वर का उपहार माना गया है और इसके अपव्यय को वर्जित किया गया है। इसी प्रकार, ईसाई धर्म में जल जीवन, शुद्धिकरण और नवीनीकरण का प्रतीक है।" अदालत ने जोर देकर कहा कि ये धार्मिक सिद्धांत 'पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन' के साथ पूरी तरह मेल खाते हैं।

पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन और कानूनी उल्लंघन

मामला कन्नमनाइडु तालाब से जुड़ा है, जो लगभग 2,000 एकड़ भूमि की सिंचाई करता है। स्थानीय किसानों ने आरोप लगाया था कि राजमार्ग निर्माण के लिए ठेकेदारों को बिना उचित खनन अनुमति के रेत और बजरी निकालने की अनुमति दे दी गई थी। न्यायालय ने पाया कि जिला कलेक्टर ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन करने के बजाय सीधे खुदाई की अनुमति दे दी, जो पूरी तरह से मनमाना और अवैध है।

पर्यावरण और संवैधानिक कर्तव्य

न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'एम.सी. मेहता बनाम कमलनाथ' मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि राज्य प्राकृतिक संसाधनों का स्वामी नहीं, बल्कि एक 'ट्रस्टी' (संरक्षक) है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण की रक्षा करना अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का हिस्सा है और अनुच्छेद 48A एवं 51A(g) के तहत राज्य और नागरिकों का संवैधानिक कर्तव्य है कि वे नदियों, झीलों और वन्यजीवों की रक्षा करें।