बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान और भारत के बीच कूटनीतिक दूरियां बढ़ती दिख रही हैं। ब्रिक्स समिट के न्योते को टालने और बढ़ते जन-विरोध के बीच क्या मोदी सरकार नए समीकरण बना पाएगी?
- प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान ने भारत के ब्रिक्स समिट के निमंत्रण पर अभी तक चुप्पी साध रखी है।
- प्यू रिसर्च के अनुसार, बांग्लादेश में भारत के प्रति नकारात्मक धारणा 51% तक पहुंच गई है।
- विशेषज्ञों का मानना है कि 'पड़ोसी नहीं बदल सकते', इसलिए भारत निरंतर संवाद की कोशिश कर रहा है।
- शेख हसीना की हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक माहौल को जटिल बना दिया है।
दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद, प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान और भारत के बीच संबंधों में एक अनिश्चितता का दौर शुरू हो गया है। जहाँ भारत ने उन्हें ब्रिक्स समिट के लिए आमंत्रित किया है, वहीं रहमान ने अपने पहले विदेशी दौरे के लिए मलेशिया और चीन को प्राथमिकता दी, जो नई दिल्ली के लिए एक कूटनीतिक झटका माना जा रहा है।
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने हाल ही में स्वीकार किया है कि दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने के लिए बातचीत चल रही है। हालांकि, 5 अगस्त को दिल्ली में अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने मौजूदा माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है। बांग्लादेशी प्रवक्ता ए.के.एम. शाहिदुल करीम के अनुसार, प्रधानमंत्री की यात्रा के लिए एक 'अनुकूल वातावरण' का निर्माण करना अनिवार्य है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows कि भारत के लिए बांग्लादेश के साथ संबंध केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं, बल्कि सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता का मामला है। बांग्लादेश के साथ 94% सीमा साझा करना भारत की रणनीतिक मजबूरी है। यदि भारत इस नए नेतृत्व के साथ संवाद स्थापित करने में विफल रहता है, तो दक्षिण एशिया में चीन का प्रभाव और अधिक बढ़ सकता है।
"दोस्त तो बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं। भारत के पास इस नई सरकार के साथ जुड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।" - पत्रकार सौरभ कुमार शाही
प्यू रिसर्च सेंटर के हालिया आंकड़ों ने एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है। 2024 में जहाँ 57% बांग्लादेशी भारत के प्रति सकारात्मक थे, वहीं 2026 तक यह घटकर केवल 42% रह गया है। अब 51% लोग भारत को लेकर नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। यह जनभावना तारिक़ रहमान के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट है, क्योंकि उन्हें अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए जनमत का सम्मान करना होगा।
विशेषज्ञों का तर्क है कि मोदी सरकार का निरंतर आउटरीच करना एक सोची-समझी रणनीति है। एक दक्षिणपंथी सरकार होने के नाते, मोदी सरकार के पास वह राजनीतिक साहस है जो अन्य दल नहीं दिखा सकते। वे बिना 'गद्दार' कहलाए, चुनौतीपूर्ण नेतृत्व के साथ बातचीत की मेज पर बैठने की क्षमता रखते हैं।
Frequently Asked Questions
1. तारिक़ रहमान ने भारत के निमंत्रण को क्यों टाला?
रिपोर्ट्स के अनुसार, रहमान ने अपने पहले विदेशी दौरों के लिए मलेशिया और चीन को चुना, जो उनके संतुलित कूटनीतिक रुख को दर्शाता है।
2. प्यू रिसर्च के सर्वे का क्या महत्व है?
यह सर्वे दर्शाता है कि बांग्लादेश की जनता के बीच भारत के प्रति विश्वास में भारी गिरावट आई है, जो किसी भी सरकार के लिए चुनौती है।