ईरान के IRGC ने होर्मुज जलडमरूमध्य के ऊपर एक अमेरिकी MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराने का दावा किया है। यह घटना उच्च-लागत वाले UAVs की कमजोरियों को उजागर करती है और भारत द्वारा लीज पर लिए गए MQ-9B सी गार्डियंस की क्षमताओं पर चर्चा छेड़ती है।
- ईरान के IRGC ने होर्मुज जलडमरूमध्य के ऊपर एक अमेरिकी MQ-9 रीपर ड्रोन को नष्ट करने का दावा किया है।
- MQ-9 रीपर की कीमत लगभग $50 मिलियन है, जो कई पारंपरिक लड़ाकू विमानों से अधिक है।
- भारत MQ-9B सी गार्डियंस का संचालन करता है, जो रीपर की तुलना में बेहतर सहनशक्ति और समुद्री सेंसर क्षमताओं वाला एक विशेष वेरिएंट है।
तेहरान और वाशिंगटन के बीच बढ़ता तनाव एक नए स्तर पर पहुंच गया है जब इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प (IRGC) ने एक अमेरिकी MQ-9 रीपर मानवरहित हवाई वाहन (UAV) को मार गिराने की घोषणा की। मेहर न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस ड्रोन को होर्मुज जलडमरूमध्य के ऊपर मिसाइल हमले से निशाना बनाया गया, जिसके बाद यह फारस की खाड़ी में जा गिरा। हालांकि अमेरिका ने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है, लेकिन यह घटना दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक में अस्थिर सुरक्षा वातावरण को दर्शाती है।
इन हवाई संपत्तियों की वित्तीय लागत चौंकाने वाली है। एक MQ-9 रीपर की कीमत लगभग $50 मिलियन है। तुलना के लिए, यह ड्रोन पाकिस्तान द्वारा उपयोग किए जाने वाले JF-17 लड़ाकू विमान (लगभग $25 मिलियन) से काफी महंगा है और भारतीय वायु सेना के HAL तेजस Mk-1A की लागत ($40-45 मिलियन) के करीब है। यह उच्च कीमत उस उन्नत खुफिया और स्ट्राइक क्षमता को दर्शाती है जो इस प्लेटफॉर्म में एकीकृत है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि इन ड्रोनों का नुकसान केवल वित्तीय नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। MQ-9 रीपर को खुफिया जानकारी जुटाने और सटीक हमलों के लिए डिज़ाइन किया गया है, लेकिन इसमें आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों के खिलाफ बचाव के कोई विशेष तंत्र नहीं हैं। यह तथ्य कि फरवरी से अमेरिका ने अपने रीपर बेड़े का लगभग 25% खो दिया है, विवादित हवाई क्षेत्रों में UAV की उत्तरजीविता (survivability) में एक गंभीर कमी को दर्शाता है।
आधुनिक सतह-से-हवा में मार करने वाली मिसाइलों के सामने उच्च-ऊंचाई वाले ड्रोनों की भेद्यता यह साबित करती है कि अब UAV के अस्तित्व के लिए स्टील्थ और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर अनिवार्य हैं।
MQ-9 परिवार में भारत का रणनीतिक हित ईरान में अमेरिका के सामरिक उपयोग से अलग है। भारत ने हाल ही में दो MQ-9B सी गार्डियंस को लीज पर लिया है और कई अन्य का ऑर्डर दिया है। रीपर के विपरीत, जो भूमि और समुद्र दोनों पर लक्ष्यों को नष्ट करने वाला एक मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म है, सी गार्डियन मुख्य रूप से समुद्री टोही (maritime reconnaissance) के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसका विंगस्पैन (79 फीट) अधिक है और यह 30 घंटे तक उड़ान भर सकता है, जिससे यह हिंद महासागर के विशाल क्षेत्रों की निगरानी करने में सक्षम है।
| विशेषता | MQ-9 रीपर | MQ-9B सी गार्डियन |
|---|---|---|
| प्राथमिक भूमिका | सटीक हमला और खुफिया जानकारी | समुद्री टोही (Reconnaissance) |
| सहनशक्ति (Endurance) | 27 घंटे | 30 घंटे |
| विंगस्पैन | मानक | 79 फीट (विस्तारित) |
| विशेष क्षमता | हेलफायर मिसाइलें | पनडुब्बी का पता लगाना |
सी गार्डियन को विशेष रूप से समुद्री क्षेत्र के लिए तैयार किया गया है, जिसमें ऐसे सेंसर लगे हैं जो जहाजों पर नजर रख सकते हैं और संभावित रूप से पनडुब्बियों का पता लगा सकते हैं—जो UAV के लिए एक दुर्लभ क्षमता है। इसके अलावा, सी गार्डियन को नागरिक हवाई अड्डों से संचालित होने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जो भारतीय रक्षा मंत्रालय को अपनी सीमाओं और आसपास के समुद्रों की निगरानी में अधिक लचीलापन प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या ईरान द्वारा गिराया गया ड्रोन वही है जिसका उपयोग भारत करता है?
नहीं, ईरान ने MQ-9 रीपर को गिराया है, जबकि भारत MQ-9B सी गार्डियन का उपयोग करता है, जो भूमि-आधारित हमलों के बजाय समुद्री निगरानी के लिए अनुकूलित है।
प्रश्न 2: MQ-9 रीपर अपना बचाव क्यों नहीं कर सकता?
इसे 'परमिसिव वातावरण' में संचालित करने के लिए बनाया गया है जहाँ दुश्मन की वायु रक्षा को पहले ही निष्क्रिय कर दिया गया हो; इसमें आधुनिक मिसाइलों से बचने की चपलता नहीं है।