नेपाल और तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर फटने से आई विनाशकारी बाढ़ में मरने वालों की संख्या 900 पार कर गई है। भारत और चीन के विशेषज्ञों की मदद से नेपाली सेना मलबे से भरी हाइड्रोपावर टनल में फंसे लगभग 900 श्रमिकों को बचाने के लिए युद्ध स्तर पर अभियान चला रही है।
- नेपाल-तिब्बत सीमा पर विनाशकारी ग्लेशियर फटने से भीषण बाढ़ आई है, जिसमें अब तक 900 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लापता हैं।
- बचाव दल का मुख्य ध्यान कीचड़ और मलबे से बंद हो चुकीं दर्जनों हाइड्रोपावर परियोजनाओं के टनल में फंसे 900 से अधिक श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकालने पर है।
- इस बेहद जटिल और खतरनाक रेस्क्यू ऑपरेशन में नेपाली सेना के साथ भारत और चीन के विशेषज्ञ भी मदद कर रहे हैं।
हिमालयी क्षेत्र में एक भीषण प्राकृतिक आपदा ने तबाही मचा दी है। नेपाल में बचाव दल बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच जमीन के नीचे फंसे सैकड़ों श्रमिकों को बचाने के लिए समय के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं। यह संकट तब शुरू हुआ जब नेपाल-तिब्बत सीमा पर एक विशाल ग्लेशियर टूटकर गिर गया, जिससे अचानक विनाशकारी बाढ़ आ गई। इस बाढ़ के साथ भारी मात्रा में बर्फ, कीचड़ और चट्टानी मलबा बहकर नीचे आ गया। आपदा में मरने वालों की संख्या 900 से अधिक हो गई है, जबकि हजारों लोग लापता हैं।
इस समय बचाव दलों की सबसे बड़ी प्राथमिकता लगभग एक दर्जन जलविद्युत (हाइड्रोपावर) परियोजनाओं की बंद पड़ी सुरंगें (टनल) हैं। माना जा रहा है कि इन सुरंगों में 930 से अधिक श्रमिक फंसे हुए हैं, जो कीचड़ और भारी मलबे के कारण पूरी तरह से बंद हो चुकी हैं। नेपाल सेना और विशेष टीमें दिन-रात काम कर रही हैं, और मलबे को हटाने के लिए भारी मशीनों का उपयोग किया जा रहा है। सेना के प्रवक्ता राजा राम बस्नेत ने बताया कि मलबे की विशाल मात्रा को हटाकर सुरंगों को खोलना एक अत्यंत कठिन चुनौती साबित हो रहा है।
इस आपदा का प्रभाव नेपाल की सीमाओं को पार कर चीन के तिब्बत क्षेत्र तक फैल गया है, जहां कम से कम 16 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है और सैकड़ों लोग लापता हैं। बीजिंग ने 2,100 से अधिक बचाव कर्मियों को तैनात किया है और राहत कार्यों के लिए 22 करोड़ युआन ($33 मिलियन) आवंटित किए हैं। नेपाल ने सामान्य खोज और बचाव कार्यों के लिए विदेशी मदद लेने से इनकार कर दिया था, लेकिन सुरंगों से सुरक्षित निकासी के विशेष अनुभव को देखते हुए उसने अपने पड़ोसी देशों चीन और भारत की तकनीकी सहायता स्वीकार की है।
हिमालयी ग्लेशियर आपदाओं का ऐतिहासिक संदर्भ
हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर दुनिया में सबसे अधिक बर्फ का घर है, जिसके कारण यह ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और हिमस्खलन के प्रति बेहद संवेदनशील है। पिछले कुछ दशकों में, वैश्विक तापमान में वृद्धि ने ग्लेशियरों के पिघलने की दर को बढ़ा दिया है, जिससे अस्थिर झीलें बन रही हैं। भारत में 2013 की केदारनाथ बाढ़ और 2021 की चमोली आपदा जैसी घटनाएं इस बात का ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि इन संवेदनशील क्षेत्रों में जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण कितना जोखिम भरा हो सकता है।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह आपदा पर्वतीय देशों में स्वच्छ ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर जलवायु परिवर्तन के गंभीर खतरों को उजागर करती है। नेपाल अपनी क्षेत्रीय ऊर्जा मांगों को पूरा करने के लिए तेजी से जलविद्युत क्षमता का विस्तार कर रहा है, लेकिन जलवायु-अनुकूल इंजीनियरिंग और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की कमी के कारण हजारों श्रमिकों की जान और अरबों डॉलर का निवेश बेहद असुरक्षित हो जाता है।
"नेपाल की यह त्रासदी एक गंभीर चेतावनी है कि उच्च-ऊंचाई वाले संवेदनशील क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन की गति हमारी आपदा-तैयारी और बुनियादी ढांचा प्रणालियों की सीमाओं से कहीं अधिक तेज है।"
| पैमाना | नेपाल में प्रभाव | तिब्बत (चीन) में प्रभाव |
|---|---|---|
| पुष्टि की गई मौतें | 903 | 16 |
| लापता लोग | 4,247 | 546 |
| लापता विदेशी नागरिक | जांच जारी | 261 (23 देशों से) |
| तैनात बचाव कर्मी | लगभग 21,000 सुरक्षा बल | लगभग 2,100 बचाव कर्मी |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: नेपाल में आई इस विनाशकारी बाढ़ का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर 1: नेपाल-तिब्बत सीमा पर एक विशाल ग्लेशियर के ढहने के कारण यह अचानक बाढ़ आई, जिसने भारी मात्रा में बर्फ, कीचड़ और मलबे को नदियों में बहा दिया।
प्रश्न 2: बचाव अभियान में हाइड्रोपावर सुरंगों पर ही सबसे अधिक ध्यान क्यों दिया जा रहा है?
उत्तर 2: इन सुरंगों के भीतर 900 से अधिक श्रमिक फंसे हुए हैं, जो कीचड़ और मलबे के कारण बंद हो गई हैं। उनकी जान बचाने के लिए उन्हें जल्द से जल्द बाहर निकालना सबसे महत्वपूर्ण है।