संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति ने घोषणा की है कि देशों का यह कानूनी दायित्व है कि वे ट्रांसअटलांटिक दास व्यापार के पीड़ितों के लिए मुआवजे पर विचार करें। समिति ने इसे इतिहास का सबसे बड़ा जबरन विस्थापन बताया है।
- संयुक्त राष्ट्र समिति ने दास व्यापार के लिए मुआवजे को देशों का कानूनी दायित्व बताया है।
- 15वीं से 19वीं शताब्दी के बीच लगभग 1.25 करोड़ अफ्रीकियों को जबरन विस्थापित किया गया था।
- यह आदेश 1965 के नस्लीय भेदभाव विरोधी कन्वेंशन पर आधारित है, न कि पुराने कानूनों पर।
- केवल वित्तीय मुआवजा पर्याप्त नहीं; अभिलेखागार खोलने और सत्य आयोग बनाने की मांग की गई है।
जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) ने एक ऐतिहासिक मार्गदर्शन जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि उन देशों पर कानूनी जिम्मेदारी है जिन्होंने ट्रांसअटलांटिक दास व्यापार में भाग लिया था। समिति के अनुसार, इन देशों को न केवल वित्तीय मुआवजे पर विचार करना चाहिए, बल्कि नस्लीय भेदभाव की उस स्थायी विरासत को भी खत्म करना चाहिए जो आज भी समाज में मौजूद है।
इस दस्तावेज़ की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह 1965 के नस्लीय भेदभाव पर अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन का हवाला देता है। अब तक, कई यूरोपीय देश और ब्रिटेन यह तर्क देते रहे थे कि उस समय दास व्यापार अवैध नहीं था, इसलिए आज वे जिम्मेदार नहीं हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने इस तर्क को खारिज करते हुए इसे एक 'पैराडाइम शिफ्ट' (दृष्टिकोण में बदलाव) करार दिया है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह कदम वैश्विक राजनीति में एक बड़ा मोड़ ला सकता है। यदि इस मार्गदर्शन को अदालतों में स्वीकार किया जाता है, तो पूर्व औपनिवेशिक शक्तियों पर अरबों डॉलर के मुआवजे का दबाव बढ़ेगा। यह केवल पैसे के बारे में नहीं है, बल्कि उन संरचनात्मक असमानताओं को ठीक करने के बारे में है जो सदियों पुराने शोषण से पैदा हुई हैं।
"हम राज्य पक्षों से ठोस और सार्थक कार्रवाई करने का आह्वान कर रहे हैं ताकि उन लोगों की गरिमा को बहाल किया जा सके जिनके कष्टों को नकारा गया या भुला दिया गया।" - पेला बोकर-विल्सन, समिति विशेषज्ञ।
ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, 15वीं और 19वीं शताब्दी के बीच कम से कम 12.5 मिलियन अफ्रीकियों को उनके घरों से छीनकर बेचा गया था। समिति का तर्क है कि भले ही उस समय के कानून अलग थे, लेकिन वर्तमान अंतरराष्ट्रीय दायित्व देशों को इन ऐतिहासिक अपराधों के प्रभावों को दूर करने के लिए बाध्य करते हैं।
समिति ने स्पष्ट किया है कि केवल चेक काटना पर्याप्त नहीं होगा। उन्होंने 'परिवर्तनकारी उपायों' की मांग की है, जिसमें सरकारी अभिलेखागार को सार्वजनिक करना, सार्वजनिक स्मारकों का पुनरीक्षण करना और स्वतंत्र सत्य आयोगों की स्थापना करना शामिल है ताकि इतिहास की सच्चाई सामने आ सके।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या यह आदेश कानूनी रूप से बाध्यकारी है?
उत्तर: यह मार्गदर्शन 1965 के एक कानूनी रूप से बाध्यकारी कन्वेंशन पर आधारित है, जिसका उपयोग अंतरराष्ट्रीय अदालतों में संदर्भ के रूप में किया जा सकता है।
प्रश्न 2: ब्रिटेन और यूरोपीय संघ की इस पर क्या प्रतिक्रिया है?
उत्तर: कई पश्चिमी देशों ने ऐतिहासिक जिम्मेदारी के दावों का विरोध किया है और मार्च में एक संबंधित यूएन प्रस्ताव से दूरी बनाई थी।