नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ में मारे गए विदेशी नागरिकों, विशेषकर भारतीयों की पहचान और उनके पार्थिव शरीर को वापस लाने के लिए भारतीय दूतावास ने डीएनए मिलान सहित नौ-चरणीय प्रक्रिया निर्धारित की है।

  • पार्थिव शरीर सौंपने के लिए नेपाल सरकार द्वारा नौ-चरणीय औपचारिक प्रक्रिया लागू।
  • अज्ञात या दफन किए गए शवों के लिए प्रथम-श्रेणी के रिश्तेदारों के साथ डीएनए मिलान अनिवार्य।
  • भारतीय दूतावास ने सहायता के लिए व्हाट्सएप हेल्पलाइन और कांसुलर समन्वय की सुविधा प्रदान की है।

नेपाल में भारतीय दूतावास ने उन विदेशी नागरिकों, जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय शामिल हैं, की पहचान और प्रत्यावर्तन के लिए एक विस्तृत परिचालन ढांचा जारी किया है, जिनकी मृत्यु हाल ही में आई भीषण अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) में हुई थी। 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास शुरू हुई इस आपदा ने उत्तरी और मध्य नेपाल में भारी तबाही मचाई, जिससे सैकड़ों लोगों की जान गई और हजारों लापता हो गए।

प्रत्यावर्तन का नौ-चरणीय प्रोटोकॉल

दूतावास की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, नेपाल सरकार ने पार्थिव शरीरों को सौंपने के लिए एक सख्त नौ-चरणीय प्रक्रिया निर्धारित की है। इस प्रक्रिया में दस्तावेजीकरण, फोटोग्राफ रिकॉर्डिंग, पोस्टमार्टम जांच, मृत्यु के कारण का सत्यापन और औपचारिक पहचान शामिल है। इसके अलावा, फिंगरप्रिंट, डीएनए और अन्य फोरेंसिक नमूनों का संग्रह, पासपोर्ट का सत्यापन और कांसुलर समन्वय के बाद रिलीज मेमो जारी करना अनिवार्य है।

इस प्रक्रिया के पहले चार चरण नेपाली अधिकारियों द्वारा पूरे किए जाएंगे। यदि परिजन नेपाल पुलिस की वेबसाइट पर अपलोड की गई तस्वीरों और विवरणों के माध्यम से शवों की पहचान करने में सक्षम होते हैं, तो भारतीय दूतावास स्थानीय अधिकारियों के साथ समन्वय कर उन्हें वापस लाने में सहायता करेगा।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि इस आपदा के पैमाने ने एक अभूतपूर्व फोरेंसिक चुनौती पैदा कर दी है। चूंकि स्वास्थ्य जोखिमों और महामारी को रोकने के लिए बड़ी संख्या में शवों को अस्थायी रूप से दफना दिया गया था, इसलिए केवल दृश्य पहचान पर्याप्त नहीं है। उच्च-तकनीकी फोरेंसिक सत्यापन पर निर्भरता हिमालयी क्षेत्र में सीमा पार आपदा प्रबंधन की जटिलता को दर्शाती है।

"प्राकृतिक आपदाओं में जब शवों की भौतिक पहचान समाप्त हो जाती है, तो डीएनए प्रोफाइलिंग ही परिवारों को निश्चितता और मानसिक शांति प्रदान करने का एकमात्र वैज्ञानिक तरीका है।"

प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए, दूतावास ने प्रथम-श्रेणी के रिश्तेदारों (माता-पिता, सगे भाई-बहन और बच्चे) की भूमिका पर जोर दिया है। इन रिश्तेदारों को ईमेल के माध्यम से अपने डीएनए प्रोफाइल भेजने या रक्त के नमूने प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है, ताकि उनकी तुलना नेपाली अधिकारियों द्वारा तैयार किए जा रहे प्रोफाइल से की जा सके।

क्या आप जानते हैं?: नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र दुनिया के सबसे भूगर्भीय रूप से अस्थिर क्षेत्रों में से एक है, जिससे यह ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOFs) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: डीएनए मिलान के लिए प्रथम-श्रेणी का रिश्तेदार कौन होता है?
उत्तर: प्रथम-श्रेणी के रिश्तेदार वे जैविक परिवार के सदस्य होते हैं जो फैमिली ट्री में ठीक एक कदम दूर होते हैं, जैसे माता-पिता, सगे भाई-बहन और बच्चे।

प्रश्न 2: परिवार पहचान प्रक्रिया कैसे शुरू कर सकते हैं?
उत्तर: परिवार नेपाल पुलिस की वेबसाइट पर फोटो देख सकते हैं या डीएनए प्रोफाइल जमा करने के लिए भारतीय दूतावास की व्हाट्सएप हेल्पलाइन से संपर्क कर सकते हैं।