हालिया एससीओ शिखर सम्मेलन ने दिखाया है कि पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करना कठिन है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

  • पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करना एक कठिन चुनौती है क्योंकि राष्ट्र नैतिकता के बजाय अपने हितों को प्राथमिकता देते हैं।
  • भारत को अपनी सुरक्षा और रक्षा संबंधों को इतना मजबूत करना चाहिए कि पाकिस्तान का प्रभाव स्वतः ही कम हो जाए।
  • अमेरिका और सऊदी अरब के साथ भारत की बढ़ती भागीदारी ने पाकिस्तान के प्रभाव को काफी हद तक बेअसर कर दिया है।

हालिया शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन ने एक महत्वपूर्ण सबक दिया है: पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर पूरी तरह से अलग-थलग करने के भारत के प्रयास अपनी सीमाओं का सामना कर रहे हैं। पाकिस्तान ने एक बहुपक्षीय संगठन की अध्यक्षता संभाली है जिसका मुख्य केंद्र आतंकवाद का मुकाबला करना है। यह स्थिति भारत के लिए एक रणनीतिक चुनौती पेश करती है कि क्या वह अन्य देशों के साथ अपने संबंधों का विस्तार करने में पर्याप्त रूप से सफल हो रहा है।

रणनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारत की नीतियां सही दिशा में हैं। इस्लामाबाद को वैश्विक मंच पर कमजोर करना और प्रतिबंधों के लिए दबाव बनाना राज्यकला (statecraft) का एक सामान्य हिस्सा है। हालांकि, समस्या तब आती है जब हम यह मान लेते हैं कि किसी देश को प्रभावी ढंग से अलग-थलग करना आसान है। वास्तविकता यह है कि राष्ट्र अपनी नैतिकता से अधिक अपने राष्ट्रीय हितों से संचालित होते हैं।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में 'नैतिकता' अक्सर 'हितों' के सामने गौण हो जाती है। उदाहरण के लिए, अमेरिका ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान पर कई बार कड़े रुख अपनाए हैं, लेकिन अफगानिस्तान में अपने हितों के कारण वह कभी भी पाकिस्तान के साथ पूर्ण संबंध विच्छेद नहीं कर पाया।

पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश करने के बजाय, भारत को अपनी रणनीतिक स्थिति इतनी मजबूत करनी चाहिए कि पाकिस्तान का प्रभाव अप्रासंगिक हो जाए।

भारत के लिए एक प्रभावी रणनीति वह नहीं है जो केवल पाकिस्तान पर केंद्रित हो, बल्कि वह है जो भारत की अपनी क्षमताओं और विकल्पों को बढ़ाए। पिछले दो दशकों में अमेरिका के साथ भारत के संबंधों में जो 'डी-हाइफ़नेशन' (de-hyphenation) देखा गया, वह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वाशिंगटन ने पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह खत्म नहीं किया, लेकिन भारत के साथ आर्थिक, सुरक्षा और राजनीतिक तालमेल को इतना गहरा कर दिया कि दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति प्राथमिकता बन गई।

यही मॉडल सऊदी अरब के मामले में भी लागू होता है। पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब के ऐतिहासिक संबंध हैं, फिर भी भारत ने आर्थिक और रणनीतिक तालमेल के माध्यम से सऊदी अरब के साथ अत्यंत मजबूत और निरंतर संबंध विकसित किए हैं। इससे पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ समीकरण काफी हद तक महत्वहीन हो गए हैं।

अंततः, अलगाव शून्य में नहीं होता। यदि कोई राष्ट्र अपने प्रतिद्वंद्वी को वास्तव में अलग-थलग करना चाहता है, तो उसे अपनी स्थिति इतनी मजबूत करनी होगी कि अन्य देश संकट के समय स्वतः ही उसके साथ खड़े हों। भारत को SCO और BRICS जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भी यही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

Did You Know?: 'डी-हाइफ़नेशन' एक राजनयिक शब्द है जिसका अर्थ है दो देशों के बीच के संबंधों को एक साथ जोड़कर न देखना, जिससे एक देश दूसरे की गलतियों के कारण दंडित न हो।

Frequently Asked Questions

1. क्या भारत पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग कर सकता है?
पूरी तरह से अलग-थलग करना कठिन है क्योंकि अन्य देश अपने हितों के कारण पाकिस्तान के साथ जुड़े रहते हैं, लेकिन भारत अपनी स्थिति मजबूत कर प्रभाव कम कर सकता है।

2. 'डी-हाइफ़नेशन' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि किसी देश (जैसे अमेरिका) के लिए भारत और पाकिस्तान के साथ संबंध अलग-अलग देखने योग्य हैं, न कि एक ही सिक्के के दो पहलू।