क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने अमेरिकी प्रतिबंधों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि रूस जानबूझकर 'डी-डॉलरइजेशन' नहीं कर रहा, बल्कि अमेरिकी दबाव ने देशों को अपनी मुद्राओं की ओर धकेला है।

  • रूस ने अमेरिका द्वारा व्यापारिक भागीदारों पर लगाए गए प्रतिबंधों को 'अवैध और अस्वीकार्य' करार दिया है।
  • दिमित्री पेसकोव के अनुसार, अमेरिका स्वयं डॉलर पर से वैश्विक विश्वास खत्म कर रहा है।
  • रूस का दावा है कि वह डॉलर के खिलाफ नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय हितों के लिए अपनी मुद्रा का उपयोग कर रहा है।

नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन से पहले क्रेमलिन ने अमेरिका के आर्थिक दबाव के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने एक वर्चुअल बातचीत में कहा कि अमेरिका का यह प्रयास कि वह रूस के व्यापारिक सहयोगियों को दंडित करे, पूरी तरह से अनुचित और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के विपरीत है।

यह विवाद तब गहरा गया जब अमेरिकी सीनेट ने 'लिंडसे ग्राहम सेंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026' पारित किया। इस कानून के तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है जो रूसी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के सबसे बड़े खरीदार हैं। यह प्रावधान सीधे तौर पर भारत जैसे देशों को प्रभावित कर सकता है, जो रूस से भारी मात्रा में तेल आयात करते हैं।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के पुनर्गठन का संकेत है। जब अमेरिका डॉलर को एक 'भू-राजनीतिक हथियार' के रूप में उपयोग करता है, तो दुनिया के अन्य देश अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए वैकल्पिक प्रणालियों की तलाश करते हैं। इससे डॉलर का वैश्विक प्रभुत्व धीरे-धीरे कम हो सकता है।

पेसकोव ने स्पष्ट किया कि रूस ने डॉलर और यूरो के उपयोग के अधिकार से वंचित होने के बाद अपनी मुद्रा का उपयोग करना शुरू किया। उन्होंने तर्क दिया कि यदि अमेरिका चाहता कि डॉलर दुनिया की आरक्षित मुद्रा बनी रहे, तो वह इसे प्रतिबंधों का जरिया नहीं बनाता।

"अमेरिका खुद डॉलर के आरक्षित मुद्रा होने के दर्जे को नष्ट कर रहा है, क्योंकि विश्वास टूटने पर दुनिया राष्ट्रीय मुद्राओं की ओर मुड़ती है।"

रूस ने यह भी स्पष्ट किया कि BRICS किसी के खिलाफ नहीं है, बल्कि सदस्य देशों के राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए है। रूस अब अपनी सीमा पार भुगतान प्रणालियों को मजबूत कर रहा है ताकि पश्चिमी प्रतिबंधों का असर कम किया जा सके।

क्या आप जानते हैं?: रूस ने पिछले कुछ वर्षों में अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लगभग 90% भुगतान गैर-डॉलर मुद्राओं में करने का लक्ष्य रखा है।
बिंदुअमेरिकी दृष्टिकोणरूसी दृष्टिकोण
डॉलर का उपयोगसुरक्षा और प्रतिबंधों का साधनभू-राजनीतिक हथियार
BRICS का उद्देश्यडॉलर पर हमलाराष्ट्रीय हितों का समूह
प्रतिबंधवैश्विक कानून लागू करनाअवैध हस्तक्षेप

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या रूस जानबूझकर डॉलर को खत्म करना चाहता है?
नहीं, पेसकोव के अनुसार रूस 'डी-डॉलरइजेशन' की नीति नहीं अपना रहा, बल्कि प्रतिबंधों के कारण मजबूरी में अपनी मुद्रा का उपयोग कर रहा है।

2. अमेरिकी प्रतिबंधों का भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
नए अमेरिकी कानून के तहत, रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाया जा सकता है, जिससे भारत जैसे प्रमुख खरीदारों के लिए व्यापारिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं।